घोसला बया का :सार्थकता उलझनों की
आज अपनी एक पुरानी रचना को देखा ,तब विचार आया हर सृजन को उलझनों से गुजरकर आकार लेना होता है और यही उलझनों का ताना- बाना किसी भी सृजन की सुंदरता को सार्थकता देता है.आज अपनी वही पुरानी रचना आपके साथ बाटती हूँ .....
जीवन नाम है कुछ उलझे कुछ सुलझे धागो का खेल है बस कुछ टूटते कुछ निभते वादो का बढ़ते हुए कभी हौसलों कभी गिरते इरादो का समय के मोड़ से झांकती कुछ खट्टी मीठी यादों का पर क्या सच ही इतनी उलझन है,पर लगता बस दृष्टिकोण का अंतर है बाकि सब भ्रम है जब जब उलझता है धागो का ताना बाना तब कच्चे पक्के रंगो में आकर लेती है कोई रचना तब समझ आती है सार्थकता उलझनों की जब खूबसूरत सा सामने आता है "बया" का आशियाना कितना जटिल कितना उलझा कितना गुंथा हुआ आकार फिर भी एक ज़िन्दगी को देता है वो आधार और एक ज़िन्दगी करती है उसकी हर उलझन के साथ उसे स्वीकार सोच बदलने से शायद सच भी बदल जाता है जीवन का ......
Monday, 6 July 2015
Sunday, 5 July 2015
Thursday, 2 July 2015
जीवन के किस मोड़ पर हम ये भूल जाते है कि अपने तय किये हुए लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए जीवन के जो बहुमूल्य क्षण हम लगते है वो कभी दुबारा लौट कर वापस नहीं आते और हमारा ये हठ कि लक्ष्य प्राप्ति ही हमे ख़ुशी देगा एक नादान बच्चे कि जिद्द की तरह है .हम एक नादान बच्चे की तरह जब जिद कर सकते है तो उसी मासूमियत से हम एक बच्चे कि तरह हर छोटी ख़ुशी में खुश क्यों नहीं होते .लक्ष्य तक पहुचने के सफर में भी हमे खुशियाँ ढूंढनी पड़ेंगी क्योकि एक प्रसन्नचित व्यक्तित्व ही सफलता कि ऊँचाइयों तक पंहुचा सकता है.
उम्र के इस दौर में मैंने ये सीखना शुरू किया है , और प्रतिदिन इस सीख को अपने जीवन में उतरती हुई अपने जीवन के सफर का आनंद ले रही हूँ.नमन मेरे गुरु को .
हमारे अंदर का बच्चा खिलखिलाना चाहता है खुलकर अपने सहज रूप में ,अपनी हर नादानी के साथ ,मासूमियत की बारिश में नहाते हुए.मै प्रयासरत हूँ क्या आप तैयार है? इस विचार के साथ आपको गुलज़ार साहेब कि पंक्तियों के साथ छोड़ जाती हूँ.......
दिल तो बच्चा है जी ,थोड़ा कच्चा है जी ......
सादर
Wednesday, 1 July 2015
शायराना सी है ज़िंदगी की फ़ज़ा,आप भी ज़िंदगी का मज़ा लीजिये ......
जिस तरह आप चाहे नज़र आऊँ मै ,मुझको हर रंग में आज़मा लीजिये
शायराना सी है ज़िंदगी की फ़ज़ा ,आप भी ज़िंदगी का मज़ा लीजिये
मै ग़ज़ल बन गयी आपके सामने ,आप भी आज मुझे गुनगुना लीजिये
Monday, 29 June 2015
काँटो से दोस्ती कर फिर हम गुलाबों सा महकेंगे
गुलाबी इस गुलाब की सुंदरता कितनी मोहक ,मन को प्रसन्न और शांत करती हुई और हम मंत्रमुग्घ से हो जाते है देख कर इसे .पर क्या हमने कभी महसूस किया इस सुंदरता की सार्थकता तक पहुचने में कितने काँटों का साथ उसे स्वीकारना होता है, तब खिल कर आता है मुस्कुराता एक गुलाब अपने सुन्दरतम और शुद्धतम रूप में .हम भी खिल सकते है अपने शुद्धतम और सुन्दरतम रूप में अपने जीवन की हर उँची- नीची पगडंडियों को स्वीकार कर उसकी हर सीख के साथ स्वयं के व्यक्तित्व को आकर देते हुए ,एक पथिक की तरह आगे बढ़ते हुए .किसी ने सच ही कहा था एक दिन मुझसे कोशिश करने वालो की हार नहीं होती.मै प्रयासरत हूँ इस गुलाबी गुलाब के रंग में रंगती हुई,अपने सुन्दरतम और शुद्धतम रूप में खिलने को हर काँटों की उलझन को स्वीकार कर जीवन बगियाँ में गुलाबी आभा बिखेरने के लिए ......
ज़िंदगी तेरे हर रंग हर रूप को स्वीकारा हमने
ज़िंदगी तेरे हर रंग हर रूप को स्वीकारा हमने
तेरी हर साँझ हर धूप को स्वीकारा हमने
कभी उजाले से नहाये ,कभी काले बादल छाये
हंसी की फुहारें कभी,आंसुओ के सावन आये
गुनगुनी धूप में खिले हम, गुलमोहर सा छाये
कभी अँधेरी रात में रातरानी बन मुस्कुराये
काँटो से दोस्ती कर फिर हम गुलाबों सा महकेंगे
टेसुओ सा झूमते हुए, कभी महुए सा बहकेंगे
रजनीगंधा की सुगंध बन बगिया में महकेंगे
चमेली,बेला जूही कभी चंपा बन बहकेंगे
हर सांस में ,हर आस में ,ढूंढते हुए पुकारा हमने
ये ज़िंदगी हर हाल में तेरा साथ स्वीकारा हमने
ये ज़िंदगी हर हाल में तेरा साथ स्वीकारा हमने...........
Wednesday, 10 June 2015
और वो अचानक बड़ी हो गयीं ....
अब सोचती हूँ तो पाती हूँ येतुम, हाँ तुम ही तो हो जो साथ थे तब भी
जब कोई अटखेलियां बालों पे महससू होती थी
कुछ हलकी सी छुअन जो गालो पे महसूस होती थी
बादलो की ओट से वह चाँद बन झाँकता कोई
डालियों में सजे उस मोंगरे से तकता कोई
दूर मँदिरो की घंटियों में पुकारते से तुम ही तो थे
तुम ही थे आईने में मेरी नज़रे उतारते से तुम ही तो थे
वो इठलाती फुदकती थी पंछियो के साथ जब
झलकते थे मेरी खिलखिलाहटों में मेरे साथ तब
नाम क्या दूँ तुम्हे, बस अहसाह हो
कहीं भी नहीं ,फिर भी आस पास हो
जाने किस मोड़ पे छोड़ दिया इन अहसासों ने साथ मेरा
दुनिया ने बना दिया उम्र से पहले मुझे बड़ा
और तुम भी नहीं थे तब जो नज़रे उतारते मेरी
खो गयीं वो अटखेलियां ,वो चाँद से गप्पे लड़ाना
वो मोंगरे की महक , वो चिड़ियों के संग चहचहाना
क्योकि मै अचानक बड़ी हो गयीं
अपने सपनो की एक लम्बी फेहरिस्त को
अपनी डायरी में दबा कर चल पड़ी थी अनजान दुनियाँ में
अपने सपने तलाशते हुए ,दिशाविहीन सी मै
और मुझमें मै बन कर कही छुप गए तुम, ऐ अहसास मेरे
जिसकी आज तक तलाश है मुझे ज़िंदगी की तरह, जीने के लिए ..........
Monday, 1 June 2015
जब हम प्रकृति के निकट होते है तो स्वयं के और निकट आ जाते हैं.हर तरफ फैली सुंदरता मन को और सुन्दर , शांत ,संवेदनशील बना देती है और हम तब अपने स्वाभाविक रूप में पहुंच जाते है .ऐसा ही कुछ अनुभव मैंने किया मनाली की सुन्दर पहाड़ियों में पहुंच कर. हर तरफ कितनी सौम्यता ,सुंदरता और प्रेम बरस रहा था प्रकृति का और बर्फ से ढकी चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी जैसे अपने प्रियतम के सानिध्य में खिल उठा हो रूप और भी निखरता हुआ उन पहाड़ियों का .एक अद्भुत अहसास था हवाओ में ,जैसे संगीत चल रहा हो जीवन का और उसकी धुन पे नाच रहीं हो वहाँ की पहाड़ियाँ ,नदियाँ, झरने ,पगडंडियां और मन मंत्रमुग्ध सा है अब तक स्वयं को खोजता हुआ सा .....
कुछ पल गुनगुनाते हुए
प्रकृति की गोद में कुछ हसते कुछ गाते पल
बिताये हैं मैंने किसी धुन में गुनगुनाते पल
हवाओ की सर सर ,वह झरनो का कल कल
रिमझिम फुहारों से भीगा, कुछ ठिठुरा हर पल
बिताये हैं मैंने किसी धुन में गुनगुनाते पल
बहती है मौज में इठलाती, उन नदियों की हलचल
मन बहता रहा एक लहर बन मौजों सा चंचल
बिताये हैं मैंने किसी धुन में गुनगुनाते पल
एक प्रतिध्वनि की चाह में बीतता रहा कल
आज गूंजती है पहाड़ो से खुद की आवाज़ हर पल
बिताये हैं मैंने किसी धुन में गुनगुनाते पल....
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