Tuesday, 24 May 2016
Saturday, 21 May 2016
घर तो बस घर होता है
दिन भर कितना भी उड़े उन्मुक्त पंछी
ढलती शाम के साथ नीड़ की तलाश होती है
और बांहे पसारे इंतज़ार लिए आँखों में
नीड़ को भी उसके मुस्कराहट भरे चेहरे की आस होती है
सच ही तो है प्रकृति भी डोल उठती है
जब निःशब्दता लिए प्रीतिध्वनियां बोल उठती है
तभी झांकता है वो चाँद लुक छिप कर बदलो से
प्रकृति राज़ जाने कितने यूँ खोल उठती है
Sunday, 15 May 2016
गुलमोहर मेरा ...
शीतल सी छाँव तेरी और उसपे झूमकर मुस्कुराना तेरा
हर पथिक को अहसास यूँ घर का का दे जाना तेरा
वह लहराते हुए लबरेज़ फूलों से झुक जाना तेरा
धूप में भटके मन को एक ठहराव सा दे जाना तेरा
सच ही है ईश्वर जाने किस किस रूप में आता है
कभी आकाश की मेहराब से झांकता चाँद बन मुस्कुराता है
कभी मेरे गुलमोहर सा मदमस्त मगन लहराता है
हाँ गाता है साथ मेरे ,मन में कोई गीत बन उभर आता है
Wednesday, 4 May 2016
Bliss
वह मौन मुस्कुराता सा ...
जब कुछ नहीं रहता बस वह रहता है
न मैं रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा
सांसो की लय पे कभी मद्धम सा थिरकता सा
दूर पहाड़ों में जैसे बर्फ सा पिघलता सा
न मैं रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है
अंतस से अनन्त में समाता हुआ वह मौन मुस्कुराता सा
जब कुछ नहीं रहता बस वह रहता है
न मैं रहता ,न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा
मन की लहरों को सागर में उड़ेलता सा
ढलते सूरज सा आकाश में लालिमा उकेरता सा
न मैं रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है
रात बन भोर की आगोश में सिमटता वह मौन मुस्कुराता सा
जब कुछ नहीं रहता बस वह रहता है
न मैं रहता ,न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा
Tuesday, 3 May 2016
वक़्त ..
वक़्त कभी थमता कभी भागता सा
वक़्त कभी सोया कभी जागता सा
वक़्त चल रहा है ,हर पल बदल रहा है
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है
किसी के लिए उचाइयां लिए
कहीं मन में गहराइयाँ लिए
मुठ्ठी में भरी रेंत सा हर पल फिसल रहा है
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है
वक़्त कभी थमता, कभी भागता सा
वक़्त कभी सोया, कभी जगता सा
वक़्त चल रहा है ,हर पल बदल रहा है
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है
Monday, 18 April 2016
दुनिया अनोखी सी...
जाने किस दुनिया में पलती है
कुछ तेरे भीतर, कुछ मेरे अंदर चलती है
दूर इस दुनिया से, एक दुनिया अनोखी सी
जीवन से लबरेज़ ,जीवन बन ढलती है
न सपनो के पास ,ना हकीकत के करीब
कुछ अधखुली नींद सी, आँखों में मचलती है
समय की परिधि पे टंगी ,उस खिड़की के पार
दूर उस क्षितिज पर ,लालिमा बन उभरती है
दूर इस दुनिया से, एक दुनिया अनोखी सी
जीवन से लबरेज़ ,जीवन बन ढलती है
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