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Saturday, 26 November 2016




रौशनी कायम रहे....


खाली कलम से नज्मे ,उतरती नहीं पन्नो पर 
रूह जब बहती है, कोई नगमा उतर आता है
खो जाता है कभी हौसला ,कुछ घटते बढ़ते चाँद सा
टिमटिमाते है लफ्ज तभी ,जब चाँद मेरे अंगना उतर आता है 




Friday, 11 November 2016






वक़्त की शाख से लम्हे तोड़ लेना
ज़िन्दगी सीखा देती है, बारिश मे भी धूप ओढ़ लेना

रात की चादर लपेटे
एक नयी सुबह आँखों में बसाये
पलकों में तकते खड़े है ख़्वाब
इंतज़ार लिए ,जाने कब आँखों को नींद आये
सुदूर चमकता है मन के पटल पर 
वो तकते ख्वाबो का साया जाने क्यों
खूबसूरत बहुत है इन्द्रधनुष की तरह और
ज़िंदगी फिर तैयार है सतरंगी रंगो में रंगने के लिए ..

Monday, 7 November 2016




वसुंधरा  की धुन...

चल दिए सब परिंदे नीड़ की राह में 
थम गयी है शाम फिर एक सुबह की चाह में 
थक कर हर परिंदो को फिर घरोंदो में सोना है 
धुन्धलकी शाम को मिला चांदनी बिछोना है 
चाँद फिर मन में   शरगम  कोई गा रहा 
मोड़ पे खड़ा देखो गुलमोहर फिर मुस्कुरा रहा 

सुबह फिर देखो एक तलाश लेकर आएगी 
जीवन की धुन हर सांस फिर गुनगुनायेगी 
हर रात को फिर एक दिन में खोना है 
हर दिन का अपना कु छहँसना कुछ रोना है 
हर अँधेरा कुछ रौशनी की तलाश में गा रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो पलास गुनगुना रहा

प्रकृति हर पल धुन नया सुना रही 
बरखा की चाहमें लो दूर टिटहरी गा रही 
आज बादलो की ज़िद है उमड़ कर नहीं खोना है 
खुल कर आज प्यासी वसुंधरा को भिगोना है 
संगीत धरा का हर अंश अंश सुना रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो कदम्ब झूमा जा रहा 

Saturday, 15 October 2016





शारद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें ...
जय श्री राधे-कृष्णा 

शरद के  चाँद  की  राह  में 
लालिमा  बिछाता सुदूर  क्षितिज  पर 
धरा को बाँहों में समेटता विस्तृत आकाश 
सुगन्धित हो उठी गोधूलि बेला ,निशा का इंतज़ार लिए

आयी हैं न निशा देखो धवल चांदनी की चुनरी ओढ़ 
टिमटिमाते तारो का श्रृंगार कर 
रोम रोम से बहाती प्रेम, ओंस बना संसार में 
सुसज्ज्तीत हो उठी निशा ,प्रियतम चाँद का प्यार लिए  

चलो कान्हा तुम चाँद बनो ,मैं निशा बन जाती हूँ
छनती रहे तेरी चांदनी,मेरे कण कण से निरंतर 
झरता रहे प्रकाश तेरा ,मेरा अंतर तिमित चिर कर 
छा जाओ मेरे अस्तित्व के आकाश में ,अपना विस्तार लिए 




 


Saturday, 8 October 2016



क्षितीज

क्षितीज से टकरा कर  लौटी  हो  जैसे
आवाज़ दिल की अनुगंज  की तरह ...

Thursday, 29 September 2016



अनुगूँज ..
शब्दों से परे कुछ लम्हे ,कुछ रिश्ते ,कुछ अंश जीवन के
परिभाषाओ की परिधि से परे ,कुछ सच खड़े है मुस्कुराते हुए
बादल का वसुंधरा से नाता देता है नित नया अंकुरण
और धरती तपन से तृप्ति की राह में ओढ़ लेती है धानी चुनर
लहरो का सागर में उमड़ना,फिर सिमट सागर हो जाना
कौन ढूंढता शब्दों को ,जब मन भाये लहरो का गुनगुनाना
भीगती धरती ,उमड़ती लहरे और और चाँद मुस्कुरा रहा
जाने किसकी याद में ,लो दूर पपीहा भी गा रहा
और खड़ी परछाई ने जैसे सच सा कोई पा लिया
तन के आगोश में उसने, खुद को फिर समां लिया
जाने दूर से कहीं आते शब्द गूंज उठे इस तरह
सूरज आता जाता है ,परछाई तो साथ है एक अनुगूँज की तरह......
Vandana Agnihotri