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Tuesday, 6 December 2016



दो दिनों से इस तस्वीर पर लिखने की सोच रही थी .मन को छू गए तस्वीर पर लिखे शब्द.सच ही है कितना अद्दभुत रिश्ता है वसुंधरा और अरुण का.हर भोर जिसकी अरुणिमा में नाहाकर जी उठी है धरा और रवि भी लुटाता है अपनी रश्मियाँ मन खोल कर,कितने पास फिर भी कितने दूर ,और कितने दूर फिर भी साथ साथ,पर मौसम की प्रतिकूलता से तड़प उठी है जब वसुंधरा सूरज की  एक एक किरण के स्पर्श के लिए तो उभर आते होंगे शायद यही भाव ह्रदय में धरती के, पुकारते हए अपने अरुण को ह्रदय की गहराइयो से......

एक प्रयास इस अनमोल रिश्ते की अनुभूतियों को शब्दो में समेटने का

अरुण मेरे ...

गुनगुना अहसास तेरा मेरे आस पास रहने दे 
तेरा विस्तृत आभास कण कण में बहने दे 
तेरा स्पर्श जगा जाता है स्पंदन मुझमे 
कोहरे से लिपटी  , जब ठिठुरती है 
ये  वसुंधरा तेरी

मौसम का क्या ,आज है कल बदल जायेगा 
लुक छिप के यूँ सताने में ,तुम्हे क्या मज़ा आएगा
हिया में उमड़ता प्यार लिए ,अपना पूरा विस्तार लिए 
सदियो से पुकारा है, पुकारती रहेगी
ये वसुंधरा तेरी 

तेरे प्यार की तपन से, कितने जीवन पलते है 
सुंदर सी प्रकृति बन, मेरी अंक में ढलते है 
उड़ेल दो अब रश्मियाँ, कोहरे की ओट से
आँचल अपना फैलाएल निहारती है 
ये वसुंधरा तेरी 


Saturday, 26 November 2016




रौशनी कायम रहे....


खाली कलम से नज्मे ,उतरती नहीं पन्नो पर 
रूह जब बहती है, कोई नगमा उतर आता है
खो जाता है कभी हौसला ,कुछ घटते बढ़ते चाँद सा
टिमटिमाते है लफ्ज तभी ,जब चाँद मेरे अंगना उतर आता है 




Friday, 11 November 2016






वक़्त की शाख से लम्हे तोड़ लेना
ज़िन्दगी सीखा देती है, बारिश मे भी धूप ओढ़ लेना

रात की चादर लपेटे
एक नयी सुबह आँखों में बसाये
पलकों में तकते खड़े है ख़्वाब
इंतज़ार लिए ,जाने कब आँखों को नींद आये
सुदूर चमकता है मन के पटल पर 
वो तकते ख्वाबो का साया जाने क्यों
खूबसूरत बहुत है इन्द्रधनुष की तरह और
ज़िंदगी फिर तैयार है सतरंगी रंगो में रंगने के लिए ..

Monday, 7 November 2016




वसुंधरा  की धुन...

चल दिए सब परिंदे नीड़ की राह में 
थम गयी है शाम फिर एक सुबह की चाह में 
थक कर हर परिंदो को फिर घरोंदो में सोना है 
धुन्धलकी शाम को मिला चांदनी बिछोना है 
चाँद फिर मन में   शरगम  कोई गा रहा 
मोड़ पे खड़ा देखो गुलमोहर फिर मुस्कुरा रहा 

सुबह फिर देखो एक तलाश लेकर आएगी 
जीवन की धुन हर सांस फिर गुनगुनायेगी 
हर रात को फिर एक दिन में खोना है 
हर दिन का अपना कु छहँसना कुछ रोना है 
हर अँधेरा कुछ रौशनी की तलाश में गा रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो पलास गुनगुना रहा

प्रकृति हर पल धुन नया सुना रही 
बरखा की चाहमें लो दूर टिटहरी गा रही 
आज बादलो की ज़िद है उमड़ कर नहीं खोना है 
खुल कर आज प्यासी वसुंधरा को भिगोना है 
संगीत धरा का हर अंश अंश सुना रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो कदम्ब झूमा जा रहा 

Saturday, 15 October 2016





शारद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें ...
जय श्री राधे-कृष्णा 

शरद के  चाँद  की  राह  में 
लालिमा  बिछाता सुदूर  क्षितिज  पर 
धरा को बाँहों में समेटता विस्तृत आकाश 
सुगन्धित हो उठी गोधूलि बेला ,निशा का इंतज़ार लिए

आयी हैं न निशा देखो धवल चांदनी की चुनरी ओढ़ 
टिमटिमाते तारो का श्रृंगार कर 
रोम रोम से बहाती प्रेम, ओंस बना संसार में 
सुसज्ज्तीत हो उठी निशा ,प्रियतम चाँद का प्यार लिए  

चलो कान्हा तुम चाँद बनो ,मैं निशा बन जाती हूँ
छनती रहे तेरी चांदनी,मेरे कण कण से निरंतर 
झरता रहे प्रकाश तेरा ,मेरा अंतर तिमित चिर कर 
छा जाओ मेरे अस्तित्व के आकाश में ,अपना विस्तार लिए 




 


Saturday, 8 October 2016



क्षितीज

क्षितीज से टकरा कर  लौटी  हो  जैसे
आवाज़ दिल की अनुगंज  की तरह ...