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Thursday, 30 April 2015

 ढूंढते है हम तुम्हे उस कोयल की कूक में  

अमराई से झांकती उस सुबह की धूप में 
पुरवाई में इठलाते उस गुलमोहर के रूप में
मुढ़ेर पे मेरे रोज़ जो आती है बेहिचक 
ढूंढते है हम तुम्हे उस कोयल की कूक में
गौरिया जो गुनगुना रही फुदक कर  कुछ गए रही 
मैना भी देखो उसके सुर में सुर मिला रही 
मीठी बोली में अभाषित सा अहसास कोई 
दूर से जैसे कहीं तुम्हारी आवाज़ आ रही 
आँखों की पोर पे मोती यह ढहरा सा  क्या है 
उस  मद्धम अहसाह में देखो ये पहरा सा क्या 
गर्मी की शाम और  तपिश की इस मंज़र में 
छा रहा है मन पर वो कोहरा सा क्या है
अमराई से झांकती उस सुबह की धूप में 
पुरवाई में इठलाते उस गुलमोहर के रूप में
मुढ़ेर पे मेरे रोज़ जो आती है बेहिचक 
ढूंढते है हम तुम्हे उस कोयल की कूक में.......





Tuesday, 28 April 2015

                              शिव -शक्ति 

Shiv-Shakti 
प्रेम अपनी पूर्णता पर तब पहुंचता है जब स्वीकार होती है उसमे कोमलता और जटिलता दोनों ही.जहाँ साथ होते है एक ही तल पर धैर्य और अधीरता एक साथ .जहा शिव सी सरलता और  स्वाभाविकता है तो शिवा सा सौंदर्य और कोमलता .जहाँ साथ हैं ज्ञान सा ठोस आधार और प्रेम सा कोमल भाव एक ही धरातल पर .जहाँ अनुबंध हैं जनम जनम का फिर भी है व्यग्तिगत स्वतंत्रता . अद्वैत का भाव है शिव और शक्ति में फिर भी कहीं विलय नहीं किसी एक व्यक्तित्व का दूसरे में. एक सुर है तो दूसरा गीत है ,एक दूसरे का पर्याय है फिर भी उनकी अपनी अलग रीत है अलग पहचान है  ,सुर मौन है तो गीत शब्दों का ताना बना है. 
                   जब पहुंच जाता है प्रेम स्वीकृति की  चरम  सीमा पर तब गूंज उठता है संगीत जीवन में और शेष रह जाता है थिरकता हुआ प्रेम किसी उत्सव की तरह अपनी हर अपूर्णता के साथ पूर्ण हो कर .

वंदना अग्निहोत्री 

Saturday, 25 April 2015

सुप्रभात मित्रो ,


जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है ,"प्रकृति का रोष " हम ये कह कर पुकारते हैं.जो दिन रात दे रही है ,उड़ेल रही है प्रेम बिना किसी आशा के ,क्या वो रोष कर सकती है हम पर..जब पहली बार मानवता ने  इस धरती की गोद में आँखें खोली होगी,उस किलकारी  के साथ जब से उसने हमे सीने से लगाया तब से आज तक हमारा भार उठए घूमती है निरंतर.फिर ये दोष भी प्रकृति पर क्यों लगाते हैं हम .कब  लेंगे हम अपनी जिम्मेदारी कि इस मोड़ पर हमने  ही पहुँचाया धरा को हमारी. कब उठाएंगे हम जिम्मेदार कदम सुधार की तरफ. जो भी असंतुलन हुआ एक दिन में नहीं हुआ ,तो संतुलन भी सदियाँ लेगा पर क्या हमने सच में पहला कदम उठाया है उस मनोवांछित संतुलन की ओर.हमे तो आभारी होना चाहिए इस धरती का कि अपने अंदर के दर्द को बहुत समेट कर चल रही है खुद में,पर जब कभी दिल भर आता है उस माँ का तब उसके सीने  में होती उथल पुथल हिला जाती है हमे,और हम आज भी एक  दोष अंकित कर संतुष्ट हो जाते है हर बार इस दर्द को आपदा का नाम दे कर.विचार कर देखें हम आज एक साथ  यह  गहरा सत्य .....

वंदना अग्निहोत्री

Friday, 24 April 2015

मन की दशा और ज़िंदगी की दिशा ,कभी बैठ कर सोच लेते है हम जब ,अपने अंदर से ही पातें है सभी उत्तर जीवन के जो छुपा रखा है पिंजरों में हमने जाने कब से और खोलना सिर्फ हमे ही आता है अपने अंदर का वो पिंजर ,क्यों न आज हम टटोले उस चाबी को अपने अंदर ...
सुप्रभात मित्रो..

मन का बंधन खोल कर  सोचा जब
आकाश और नीला नज़र  आने लगा
चाँद  कुछ चमकीला नज़र आने लगा
याद  कुछ मीठी सी सहला गयी दिल को
फूलो  का देखो पंख लगा गयी  मुझको
सोचती हूँ उड़ चलूँ. हवाओ का  है  रुख जिधर
बहती हुई ज़िंदगी ये सीखा गयी मुझको.....


वंदना अग्निहोत्री
















Wednesday, 22 April 2015






परछाइयाँ 

बादलो की ओट से झाकता सा सूरज ,छिप जाता है  जब बदलो के आगोश में तब सिमट जाती है परछाई मुझमे मेरी, मुझे अंक में अपने लेती हुई ,कह रही हो जैसे  अंधेरो में हम और करीब है .धूप में आस पास हूँ तो छाँव  में तेरे दिल के पास हूँ ,.फूट पड़ता है प्रेम तब बारिश बन आकाश के ह्रदय से और सिमट जाती है वो अपनी बाँहों में खुद को समेट कर .शेष रह जाता बस एक मौन ,एक सवाल बन कर ........

तुझमे मेरा मुझमे ये  तेरा सा क्या है 
बंद पलकों पर एक बसेरा सा क्या है

वंदना अग्निहोत्री  





Tuesday, 21 April 2015

एक प्रतीक्षा ....राधा


राधा ,कितना मधुर नाम ,कितना पूर्ण है नाम जो शांति देता है मन को अपने एक उच्चारण से .राधा एक उपमा है प्रेम की ,प्रतीक्षा की ,प्रयास की और निहारती हुई पलकों में कृष्ण मिलन  की आस की .राधा खुद में एक खोज है फिर भी हर खोज का अंत है .राधा कृष्ण का आरम्भ और और वही अनंत है .कृष्ण की राह में कृष्ण की चाह में ,कृष्ण होती राधा और फूटता है ब्रजकण से कोई संगीत एक गीत में उभरता हुआ :



नैन निहारे बाट शयम की ,कुंजन कुंजन  गलियन  गलियन 
बस गए क्यों  परदेश पिया तुम तोड़ हमारे ह्रदय का घट
चुभती है पुरवईया तुम बिन ,सुनी लगे ये  गलियां तुम बिन
वो कदम्ब देखे राह तुम्हारी ,तकता तुमको सुना पनघट 
राधा तेरी न रही अब राधा,खोज में तेरी बन बैठी  मोहन 
आ जाओ अब श्याम पिया तुम ,खुले हमारे ह्रदय के पट....

वंदना अग्निहोत्री 

Saturday, 18 April 2015


प्रेम 

प्रेम एक अनुभूति जिसकी सुगंध महका जाती है  पूरा  जीवन,सुन्दर से फूल का  खिलना कभी देखा है आपने.एक एक पंखुड़ियों का धीरे धीरे खिलना ,जैसे सकुचाते हुए दो दिलो का मिलना .कोमलता का अहसास जैसे पहला स्पर्श प्रेम का और खिल उठना पूरी तरह मुस्कुराते हुए जैसे भर चूका हो अहसाह हल्की सी छुअन और मीठी सी चुभन के साथ दिल से होता हुआ आत्मा की गहराइयों में. जहाँ एहसास समा जाता है रोम रोम में उस सुन्दर कोमल फूल की भीनी सी सुगंध की तरह और शेष रह जाता है मौन जैसे निःशब्दता से फूट रहा हो संगीत, विलीन होता हुआ उस दूर  से आती मंदिर के घंटे की आवाज़ में जाकर.सच कहा है किसी ने प्रेम एक ईश्वरीय अनुभूति है और शाश्वत है इस प्रकृति की तरह जो हमे  दे रही है हर रोज़ बिना किसी शर्त के निरंतर नव -जीवन .
           दिल से निकलता है तब एक अहसास कुछ इस तरह गीत बन कर

एक आवाज़ जानी पहचानी सी कानो को छूकर निकल गयी,
 ये कौन अंजाना गुजरा जो जाना पहचाना लगता है.
मधुर यादो के उपवन में भाव भरे कुछ फूल खिले,
हम मन ही मन गुनगुना उठे कोई गीत पुराना लगता है
ये कौन अंजाना गुजरा जो जाना पहचाना लगता है
शब्दों में भाव समां गए ,भावो में शब्द विलीन हुए
इन अनजाने गीतों से कोई रिश्ता पुराना लगता है
ये कौन अंजना गुजर जो जाना पहचाना लगता है

वंदना अग्निहोत्री 

Friday, 17 April 2015


प्रार्थना 

सूरज की लालिमा में नहाता हुआ आकाश कितना सुन्दर और लुभावना अपनी मन की तरंगो को प्रकृति से जोड़ कर  कर ली एक प्रार्थना उसने प्रेम ही प्रेम हो इस दुनिया में हर तरफ हर जगह इस सुन्दर ईश्वरीय दृश्य की तरह .सुबह की शीतलता सबके मन को शीतल करे जिसका  आभास रात की गहरी और निश्चिन्त नींद के साथ थापकिया दे कर सुलाए हमे और  हर एक दिन हम अपने सपने पूरे करे और दूसरो को भी उनके सपनो तक पहुचाएं .हाथ से हाथ मिले, साथ को साथ मिले और इस धरा को एक सुन्दर सा  घर हम बनायें ..भाईचारा ,सौहार्द मानवता के मन में राज़ करे ,कितनी सुन्दर है ये दुनिया ये हम सब इस जीवन में जान पाएं
       एक ठंडी हवा का झोका सहला गया उसके गालो को ,कुछ छेड़ते हुए बालो को कह रहा हो जैसे स्वीकार है यह प्रार्थना मन की गहराइयो से जो की तुमने. तभी  हंस पड़ा एक  गुलाब उसके आँचल से खेलता हुआ मुड़ कर थम लिया उसने अपनी हथेलियों में  सुर्ख गुलाब को अपनी गुलाबी होंठो की छुअन के साथ .

सुप्रभात ,
वंदना अग्निहोत्री

Thursday, 16 April 2015

निर्झर लेखनी : ज़िंदगी एक बहती हुई कविता है ,जिसकी हर लहर में गोते...

निर्झर लेखनी : ज़िंदगी एक बहती हुई कविता है ,जिसकी हर लहर में गोते...: ज़िंदगी एक बहती हुई कविता है ,जिसकी हर लहर में गोते लगाना और छुपे हुए हर लम्हों से शब्दों को चुराना फिर समय की ताल में उनको  गुनगुनाना और शब...

Tuesday, 14 April 2015


लघुकथा 


गुलमोहर 


घर का सबसे खूबसूरत कोना उसे लगता ता वो पीछे की तरफ खुलता एक झरोखा जहाँ से सीधी जाती थी एक सड़क दूर शहर की ओर .दिन में कई बार घर के कामो से वक़्त चुराकर वह खड़ी हो जाती थी उस झरोखे  पे आकर और बुनने लगती थी ख्वाब खुद को उस राह से जाते  हुए देखते.खिड़की से झाकता गुलमोहर जैसे बोलता था किसका रास्ता देखती हो आगे तुम्हे जाना है चलना तुम्हे ही पड़ेगा .वह बहाने करती ,ये परेशानी  है ,ये रुकावटें हैं ये बंधन है,तब ठहाके लगा कर हस पड़ता वह गुलमोहर और कहता मुझे देखा है, हर मौसम देखा है मैंने कभी इठलाता बसंत ,तो तपता जेठ ,झूमता सावन तो कभी ठिठुरता जाड़ा ,फिर भी मै खड़ा हूँ अपनी बाहें पसारे हर मौसम के स्वागत में अपने मधुमास के इंतज़ार में .जब छा जाते हैं लाल फूल मुझपर और मै समेट लेता हूँ अपनी बाहों में उन्हें बिछड़े एक मित्र की तरह.
        उसी तरह जीवन के हर मौसम में खुद को सम्हाल कर देखो सपने और छोड़ दो उन्हें तितलियों की तरह खुले आकाश में और तुम्हे तो सिर्फ भागना हैं पूरे जोश से उनके पीछे रास्ता तो वह तितलियाँ खुद तुम्हे बताएंगी  और कोई भी बंधन सिर्फ तुम्हारे मन का भ्रम है जिसके जाल में बांध रखा है तुमने अपनी सपनो सी  तितलियों को. आज छोड़ दो उन्हें पीछा करो उनका आशाओ का पंख लगाकर और उड़ चलो उसके पीछे इस झरोखे के रस्ते आसमान में .
              उसने पा लिया था आज एक सच और लपक कर गुलमोहर की डालियो को चूमा उसने जैसे करना चाहती हो अभिनन्दन उसका ,अन्तःप्रेरणा बनने के लिए ,क्योकि आदत  जो थी उसे चिड़ियों से पेड़ो से कभी बदलो से बातें करने की और बचपन से  इनमे वो अपना उत्तर तलाशती रही है और कभी निरुत्तर नहीं रहे उसके ये प्यारे मित्र . ..
               
वंदना अग्निहोत्री

Monday, 13 April 2015

एक आशियाँ ख्वाब का हो ,आसमान की छत और फर्श गुलाब का हो 
मलमली घास पे फूलो की तकिया लगाये चल सुने तारे क्या गुनगुनाएं .......


रात की चादर लपेटे
एक नयी सुबह आँखों में बसाये
पलकों में तकते खड़े है ख़्वाब
इंतज़ार लिए ,जाने कब आँखों को नींद आये
सुदूर चमकता है मन के पटल पर
वो तकते ख्वाबो का साया जाने क्यों
खूबसूरत बहुत है इन्द्रधनुष की तरह और
ज़िंदगी फिर तैयार है सतरंगी रंगो में रंगने के लिए ..
Vandana Agnihotri

Thursday, 9 April 2015

सुप्रभात
 सु-प्रभात सच में कितना सुन्दर होता है सबेरा ,जब नींद से जाग कर प्रकृति अंगड़ाई लेती हुई ऑंखें खोलती है दूर क्षितिज में अपने सूरज की प्रतीक्षा में और अपनी लालिमा के साथ वह रोज़ सुबह आता और फैला जाता है उसके प्रेम  से भरा प्रकश प्रकृति के अंतर्मन को स्पर्श करता हुआ ,नाच उठती है प्रकृति कोयल के कूक,चिड़ियों के फुदकते संगीत के साथ  और शुरू होता है जीवन चक्र हमरा इस सुंदरता के साथ.
     फिर दिन के भागमभाग में कहा से लाते  है हम ये मन की बौखलाहट ,ये शिकायते ये गुस्सा  क्या ये हमारा सत्य है या  ये हमारा ऊपर से ओठा हुआ आवरण है .हमारा सच तो बहुत सुन्दर है इस प्रकृति की तरह प्रेम से पूर्ण और पूर्णता को खोज नहीं होती किसी की.फिर हम किस खोज में हैं  इस उत्तर की प्रतीक्षा में मै, आप हम सब प्रयासरत हैं ...
           और इसी प्रयास में  क्यों न करे हम नमन एवं अभिनन्दन उस सुंदरता का जो हमे मिला है एक और दिन की तरह आज और करे तलाश अपने अंदर छुपी सुंदरता का साथ मिल कर ....


इस  सुबह की लाली का ,फिर रात काली का
शाम के दुँधलके में झूमती उस डाली का
वो खिड़की में चहचहाती उस गौरईया मतवाली का
आंखमिचौली खेलती इठलाती बदली काली का
छेद जाती है छूकर मुझे उस हवा भोली भाली का
कुछ चुभ जाये उन बानो का या ,सहलाती मीठी बानी का
जीवन के हर रंग का ,कभी बेरंग शाम खाली का
अभिनन्दन है मन से आज ज़िन्दगी तेरी हर डाली का .... ......


Vandana Agnihotri 

Tuesday, 7 April 2015

ज़िंदगी एक बहती हुई कविता है ,जिसकी हर लहर में गोते लगाना और छुपे हुए हर लम्हों से शब्दों को चुराना फिर समय की ताल में उनको  गुनगुनाना और शब्दों का फिर निःशब्दता में विलीन हो जाना .....

     चुन ले चलो साथ में कुछ मोती छुपे हैं जो जीवन सागर में और फिरो ले कुछ कवितायेँ ,कुछ कहानियां ,कुछ गुनगुनाते पल ,कुछ आनेवाला कल कुछ बिता हुआ पल और बहने दे लेखनी अपनी निर्झर की तरह कल-कल .आप सभी के पोस्ट आमंत्रित हैं ....

सादर
वंदना अग्निहोत्री