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Friday, 10 July 2015

दर्पण


दर्पण हमारा  सच्चा साथी , कभी दर्पण में अपने तन से पार जाकर अपने मन को झाँकने का प्रयास करें हम अगर तो सामने एक नया ही वयक्तित्व  खड़ा पाते हैँ हम क्योकि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलते , बस वो तो वैसा ही सामने लातें है रूप हमारा जो हम असल में है, अपनी हर अच्छाइयों और अपनी हर बुराइयों के साथ.हम ज़िंदगी भर स्वयं को दुसरो की नज़रो से देखते बड़े होते है कभी सच्चे मन से, पूरी ईमानदारी के साथ अपना हम सामना करे दर्पण में उस दिन स्वयं को पा जाएंगे हम  और जीवन के उत्तम क्षणों में एक वो पल होगा "स्वयं की खोज "......

निहारती खुद को तुझमे पाती हूँ मै,
एक नया चेहरा ,एक नया आकर,
उमड़ते घुमड़ते ,कभी निर्झर सा बहते 
खुद के अंदर छुपे जाने कितने विचार
कभी दमकता पाया, कभी धूमिल सी काया 
सुनहरी आभा में,मन गुलाब सा खिल आया 
आईने ने  आज देखो मुझे, मुझसे ही मिलाया

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