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Friday, 12 August 2016



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 दस्तक .....


धीरे से एक दस्तक ये कैसी है दरवाजे पे आज
कोई आहट सुनी है शायद, कुछ खिलखिलाहट के साथ
धीरे  से पट खोलती वो, बोलती है दरवाजे पे आज
पहचाना, मै तेरी चाह हूँ, एक नयी राह हूँ
तेरा मै हर्ष हूँ, उत्कर्ष हूँ, तेरे साथ हूँ ,आसपास हूँ
तेरी पहली अंगड़ाई में थी, मै तेरी तरुणाई में थी
कभी बिखरी हुई किरणों में ,कभी चांदनी में ,परछाई में थी
मै ज़िंदगी हूँ तेरी, कभी थमती रही कभी बहती रही
छाव देखि साथ ,तो कभी धूप भी सहती रही
उठ अब साथ आ ,मेरे साथ तू भी गुनगुना
देख पंख कुछ परिंदो से चुरा के लाई हूँ
आज देख खुद चलकर, तुझसे मिलने आयी हूँ
चल साथ चल मेरे ,दूर कही किसी राह में.
तू औए मै रहेंगे नील गगन की छाँह में
मै ज़िंदगी तेरी हूँ बस और कोई नहीं...............

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