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Wednesday, 24 February 2016





मौन सा ईश्वर मेरा ....

एक सुन्दर आभास सा होना तेरा और
ढल जाना अपरिभाषित अनुभूति में करीने से
परिभाषाओ में बंधते कहा है, ये धरती ये अम्बर
ये बदलो में छुपता चाँद ये,ये नीला सागर
मौन सा पिघता अहसास तेरा, बर्फीली शृंखलाओं में
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
 हाँ पास ही तो हो ,मुझे छूती हवाओ में
कभी ढलती शाम के मंज़र में 
कभी सर्द- गर्म रातो की बदलती अदाओ में
बिखर जाते हो लालिमा लिए रोज़ सुबह जीवन में 
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
एक मौन बन समाएं हो मेरे अस्तित्व से अनंत तक
गूंजते हो  हर क्षण प्रतिध्वनियों की श्रृंखलाओं में 
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
एक सुन्दर आभास सा होना तेरा और
ढल जाना अपरिभाषित अनुभूति में करीने से
हां यही,बस  यही तो एक सच है नितांत सत्य 
तुम हो ,तुम ही तो हो इस अंत से अनत तक 
अपनी मौन सी  बाहें फैलाये मुझे पुकारते से 
बस मेरी  ही तरह ...




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