मन को छूती तस्वीर, जिसके स्पर्श से मन से निकले उद्गार उतर आये फिर एक रचना बन
सुदूर पर्वतों पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई
झरोखे का पट हौले से खोल कर
घुल कर हवाओं के साथ जैसे पहुँची है
कानो में मीठी से शब्द घोलती,सी
कुछ अनकही मुझसे बोलती सी
काफी की चुस्कियो में एक मिठास सी घोलती सी
सुदूर पर्वतो पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई
अपनी आहट से अनाहत जगाती हुई
कोई गीत मधुर गुनगुनाती हुई
सुदूर पर्वतो पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई ......

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