Pages

Thursday, 13 April 2017







अरुण  बोलता है

सुदूर क्षितिज पर देखा है मैंने
मिलते हैं ये धरती और गगन
मेरी अरुणिमा की झीनी चादर के पार
जाकर देखो कभी अद्भुत ये संगम

सुना है कभी इन लहरों में बहता संगीत कोई
जैसे मचलती लहरों में बह रही हो प्रीत कोई
एक प्यास सागर में समां जाने की
हाँ मैंने देखी है एक आस
हर बून्द की सागर हो जाने की

सुनो हर कण प्रकृति का कुछ बोलता है
जागोगे कब इंसान तुमसे ये तुम्हारा अरुण बोलता है


No comments:

Post a Comment