सुदूर क्षितिज पर देखा है मैंने
मिलते हैं ये धरती और गगन
मेरी अरुणिमा की झीनी चादर के पार
जाकर देखो कभी अद्भुत ये संगम
सुना है कभी इन लहरों में बहता संगीत कोई
जैसे मचलती लहरों में बह रही हो प्रीत कोई
एक प्यास सागर में समां जाने की
हाँ मैंने देखी है एक आस
हर बून्द की सागर हो जाने की
सुनो हर कण प्रकृति का कुछ बोलता है
जागोगे कब इंसान तुमसे ये तुम्हारा अरुण बोलता है
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