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Saturday, 27 May 2017








यह फूल

कितना हल्का हैं ना ये फूलसूरज की हलकी आभा के बीचमद्धम बहती हवा में झूमता सा
कुछ हवा को सुरभित कर
हौले से उन्हें चूमता सा
करता हो जैसे अपनी बाहें पसारे
सूरज की एक एक किरण का आलिंगनजैसे भर लेना चाहता है सूरज को
अपने कण कण में
जिसने पोषित किया उसके अस्तित्व को
जिसके प्रकाश ने उभारा उसे
कली की अंधेरी कोख से सुन्दरतम सहज रूप में

कितना हल्का है न फूल
सूरज की रश्मियों के बीच मुस्कुराता साखुद में मगन खुद में इठलाता सा
जैसे हर मुस्कराहट के साथ
करता हो सूरज की हर किरण का अभिनन्दन
जिससे सीखा उसने सुर्ख रंगो में खिलाना
जिसके सतरंगी रंगो से रंग चुराना
जैसे हर साँस के साथ खुद सूरज हो जाना

कितना हल्का है न फूल
हर आशंका से मुक्तअपनी उन्मुक्तता में इठलाता सा
सूरज की आभा में खुद सूरज हो जाता सा ....



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