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Friday, 13 January 2017



मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने 
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
पलाश को तलाश जिसकी ,गुलमोहर को आस जिसकी
बसंत की बयार सा क्यों रस बहाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
आसमां का हाथ थामे ,आसमां के पार तक
सतरंगी रंगो में क्यों बिखर जाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
सागर में मचलती उन लहरो सा मौज़ ले
सागर में जीवन सरिता मिलाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

Sunday, 8 January 2017




कुछ पंक्तियाँ इस तस्वीर पर ....


आसमान से उतर कर ह्रदय की गहराइयो में समाती है
अद्द्भुत एक अनुभूति है प्रेम, नैनो में सपने दे जाती है
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सिमट जाता है पूरा संसार जैसे मेरी बाहों में
जब तुम घनश्याम ले लेते हो अपनी पनाहो में

रोम रोम जैसे तेरा ही गीत गाता है
जब मधुर मुस्कान लिए तू पास मेरे आता है

पलकों पे बैठ जाते है सतरंगी सपने कई
जब पलके मूंद तू धुन कोई बजाता है

कुछ कुछ राधा सी कुछ श्याम सी है
कुछ कुछ उजियारी कुछ घनश्याम सी है

प्रीत की रीत है बड़ी अलबेली ,अटपटी
तपती धूप में, तरुवर से मिलतेआराम सी है

Tuesday, 6 December 2016



दो दिनों से इस तस्वीर पर लिखने की सोच रही थी .मन को छू गए तस्वीर पर लिखे शब्द.सच ही है कितना अद्दभुत रिश्ता है वसुंधरा और अरुण का.हर भोर जिसकी अरुणिमा में नाहाकर जी उठी है धरा और रवि भी लुटाता है अपनी रश्मियाँ मन खोल कर,कितने पास फिर भी कितने दूर ,और कितने दूर फिर भी साथ साथ,पर मौसम की प्रतिकूलता से तड़प उठी है जब वसुंधरा सूरज की  एक एक किरण के स्पर्श के लिए तो उभर आते होंगे शायद यही भाव ह्रदय में धरती के, पुकारते हए अपने अरुण को ह्रदय की गहराइयो से......

एक प्रयास इस अनमोल रिश्ते की अनुभूतियों को शब्दो में समेटने का

अरुण मेरे ...

गुनगुना अहसास तेरा मेरे आस पास रहने दे 
तेरा विस्तृत आभास कण कण में बहने दे 
तेरा स्पर्श जगा जाता है स्पंदन मुझमे 
कोहरे से लिपटी  , जब ठिठुरती है 
ये  वसुंधरा तेरी

मौसम का क्या ,आज है कल बदल जायेगा 
लुक छिप के यूँ सताने में ,तुम्हे क्या मज़ा आएगा
हिया में उमड़ता प्यार लिए ,अपना पूरा विस्तार लिए 
सदियो से पुकारा है, पुकारती रहेगी
ये वसुंधरा तेरी 

तेरे प्यार की तपन से, कितने जीवन पलते है 
सुंदर सी प्रकृति बन, मेरी अंक में ढलते है 
उड़ेल दो अब रश्मियाँ, कोहरे की ओट से
आँचल अपना फैलाएल निहारती है 
ये वसुंधरा तेरी 


Saturday, 26 November 2016




रौशनी कायम रहे....


खाली कलम से नज्मे ,उतरती नहीं पन्नो पर 
रूह जब बहती है, कोई नगमा उतर आता है
खो जाता है कभी हौसला ,कुछ घटते बढ़ते चाँद सा
टिमटिमाते है लफ्ज तभी ,जब चाँद मेरे अंगना उतर आता है 




Friday, 11 November 2016






वक़्त की शाख से लम्हे तोड़ लेना
ज़िन्दगी सीखा देती है, बारिश मे भी धूप ओढ़ लेना

रात की चादर लपेटे
एक नयी सुबह आँखों में बसाये
पलकों में तकते खड़े है ख़्वाब
इंतज़ार लिए ,जाने कब आँखों को नींद आये
सुदूर चमकता है मन के पटल पर 
वो तकते ख्वाबो का साया जाने क्यों
खूबसूरत बहुत है इन्द्रधनुष की तरह और
ज़िंदगी फिर तैयार है सतरंगी रंगो में रंगने के लिए ..

Monday, 7 November 2016




वसुंधरा  की धुन...

चल दिए सब परिंदे नीड़ की राह में 
थम गयी है शाम फिर एक सुबह की चाह में 
थक कर हर परिंदो को फिर घरोंदो में सोना है 
धुन्धलकी शाम को मिला चांदनी बिछोना है 
चाँद फिर मन में   शरगम  कोई गा रहा 
मोड़ पे खड़ा देखो गुलमोहर फिर मुस्कुरा रहा 

सुबह फिर देखो एक तलाश लेकर आएगी 
जीवन की धुन हर सांस फिर गुनगुनायेगी 
हर रात को फिर एक दिन में खोना है 
हर दिन का अपना कु छहँसना कुछ रोना है 
हर अँधेरा कुछ रौशनी की तलाश में गा रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो पलास गुनगुना रहा

प्रकृति हर पल धुन नया सुना रही 
बरखा की चाहमें लो दूर टिटहरी गा रही 
आज बादलो की ज़िद है उमड़ कर नहीं खोना है 
खुल कर आज प्यासी वसुंधरा को भिगोना है 
संगीत धरा का हर अंश अंश सुना रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो कदम्ब झूमा जा रहा