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Friday, 13 January 2017



मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने 
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
पलाश को तलाश जिसकी ,गुलमोहर को आस जिसकी
बसंत की बयार सा क्यों रस बहाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
आसमां का हाथ थामे ,आसमां के पार तक
सतरंगी रंगो में क्यों बिखर जाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
सागर में मचलती उन लहरो सा मौज़ ले
सागर में जीवन सरिता मिलाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

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