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Saturday, 23 July 2016







मैं खुद के लिए लिखती हूँ ,उस खुदा के लिए लिखती हूँ
एक खूबसूरत सा हिस्सा मेरा ,रह गया था किसी मोड़ पर
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

खूबसूरत सी बनाई है ये दुनिया किसी ने
उस बादल, उस दरिया, उस हवा के लिए लिखती हूँ
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

मदमस्त बहती है मतवाली नदियां जो झूमकर बरसती है काली बदरियां जो
इस गाती ,इस झूमती मदमस्त फ़िज़ा के लिए लिखती हूँ
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

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