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Tuesday, 24 January 2017

बच्चे हमारी जीवन बगिया में खिले सूंदर और अद्भुत फूल.क्या सोचा है हमने की किस तरह का वातावरण ,किस तरह की खाद और किस तरह के पानी से सिंचित कर रहे हैं हम इन फूलो को जिन्हें बड़े ही जतन से हमने अपनी बगिया में उगाया है.
  बच्चो के प्रथम गुरु माता पिता और पहली पाठशाला उनका अपना घर और परिवार होता है जिनके बीच वह खेलते कूदते हुए सीखते, सम्हलते हुए बड़े होते हैं. जिस तरह का आचरण वो अपने आस पास देखते हैं वही उनके मन के दर्पण पे अंकित होता जाता है.अतः आवश्यकता है हमे इस बात का ध्यान रखने की, कि हम उनके मन के दर्पण में दुनिया की, परिवार की, दोस्तों की ,व्यव्हार की किस तरह कि छबि अंकित कर रहे है ......

    तुमसे जाना सूरज भैया और चंद मेरा मामा है
    माँ बाबा का हाथ पकड़ ही मैंने चलना जाना है
    चिड़िया जो फुदकती जाना, गाती वो एक गाना है
    मन के तारो की सरगम ,बस तुमको ही बजाना है
    दे दो जैसा रूप ,ढल जाऊँ मैं वैसे है
    कच्ची माटी रच लेती सुन्दर दुनिया जैसे है  
    संस्कारो से रंगों मुझे या कर दो बेरंग मुझे
    तुम्हारे ही पदचिन्हों में चलना है संग मुझे
    तुमसे जाना सूरज भैया और चंद मेरा मामा है
    माँ बाबा का हाथ पकड़ ही मैंने चलना जाना है
   

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