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Tuesday, 6 December 2016



दो दिनों से इस तस्वीर पर लिखने की सोच रही थी .मन को छू गए तस्वीर पर लिखे शब्द.सच ही है कितना अद्दभुत रिश्ता है वसुंधरा और अरुण का.हर भोर जिसकी अरुणिमा में नाहाकर जी उठी है धरा और रवि भी लुटाता है अपनी रश्मियाँ मन खोल कर,कितने पास फिर भी कितने दूर ,और कितने दूर फिर भी साथ साथ,पर मौसम की प्रतिकूलता से तड़प उठी है जब वसुंधरा सूरज की  एक एक किरण के स्पर्श के लिए तो उभर आते होंगे शायद यही भाव ह्रदय में धरती के, पुकारते हए अपने अरुण को ह्रदय की गहराइयो से......

एक प्रयास इस अनमोल रिश्ते की अनुभूतियों को शब्दो में समेटने का

अरुण मेरे ...

गुनगुना अहसास तेरा मेरे आस पास रहने दे 
तेरा विस्तृत आभास कण कण में बहने दे 
तेरा स्पर्श जगा जाता है स्पंदन मुझमे 
कोहरे से लिपटी  , जब ठिठुरती है 
ये  वसुंधरा तेरी

मौसम का क्या ,आज है कल बदल जायेगा 
लुक छिप के यूँ सताने में ,तुम्हे क्या मज़ा आएगा
हिया में उमड़ता प्यार लिए ,अपना पूरा विस्तार लिए 
सदियो से पुकारा है, पुकारती रहेगी
ये वसुंधरा तेरी 

तेरे प्यार की तपन से, कितने जीवन पलते है 
सुंदर सी प्रकृति बन, मेरी अंक में ढलते है 
उड़ेल दो अब रश्मियाँ, कोहरे की ओट से
आँचल अपना फैलाएल निहारती है 
ये वसुंधरा तेरी 


Saturday, 26 November 2016




रौशनी कायम रहे....


खाली कलम से नज्मे ,उतरती नहीं पन्नो पर 
रूह जब बहती है, कोई नगमा उतर आता है
खो जाता है कभी हौसला ,कुछ घटते बढ़ते चाँद सा
टिमटिमाते है लफ्ज तभी ,जब चाँद मेरे अंगना उतर आता है 




Friday, 11 November 2016






वक़्त की शाख से लम्हे तोड़ लेना
ज़िन्दगी सीखा देती है, बारिश मे भी धूप ओढ़ लेना

रात की चादर लपेटे
एक नयी सुबह आँखों में बसाये
पलकों में तकते खड़े है ख़्वाब
इंतज़ार लिए ,जाने कब आँखों को नींद आये
सुदूर चमकता है मन के पटल पर 
वो तकते ख्वाबो का साया जाने क्यों
खूबसूरत बहुत है इन्द्रधनुष की तरह और
ज़िंदगी फिर तैयार है सतरंगी रंगो में रंगने के लिए ..

Monday, 7 November 2016




वसुंधरा  की धुन...

चल दिए सब परिंदे नीड़ की राह में 
थम गयी है शाम फिर एक सुबह की चाह में 
थक कर हर परिंदो को फिर घरोंदो में सोना है 
धुन्धलकी शाम को मिला चांदनी बिछोना है 
चाँद फिर मन में   शरगम  कोई गा रहा 
मोड़ पे खड़ा देखो गुलमोहर फिर मुस्कुरा रहा 

सुबह फिर देखो एक तलाश लेकर आएगी 
जीवन की धुन हर सांस फिर गुनगुनायेगी 
हर रात को फिर एक दिन में खोना है 
हर दिन का अपना कु छहँसना कुछ रोना है 
हर अँधेरा कुछ रौशनी की तलाश में गा रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो पलास गुनगुना रहा

प्रकृति हर पल धुन नया सुना रही 
बरखा की चाहमें लो दूर टिटहरी गा रही 
आज बादलो की ज़िद है उमड़ कर नहीं खोना है 
खुल कर आज प्यासी वसुंधरा को भिगोना है 
संगीत धरा का हर अंश अंश सुना रहा 
मोड़ पर खड़ा देखो कदम्ब झूमा जा रहा 

Saturday, 15 October 2016





शारद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें ...
जय श्री राधे-कृष्णा 

शरद के  चाँद  की  राह  में 
लालिमा  बिछाता सुदूर  क्षितिज  पर 
धरा को बाँहों में समेटता विस्तृत आकाश 
सुगन्धित हो उठी गोधूलि बेला ,निशा का इंतज़ार लिए

आयी हैं न निशा देखो धवल चांदनी की चुनरी ओढ़ 
टिमटिमाते तारो का श्रृंगार कर 
रोम रोम से बहाती प्रेम, ओंस बना संसार में 
सुसज्ज्तीत हो उठी निशा ,प्रियतम चाँद का प्यार लिए  

चलो कान्हा तुम चाँद बनो ,मैं निशा बन जाती हूँ
छनती रहे तेरी चांदनी,मेरे कण कण से निरंतर 
झरता रहे प्रकाश तेरा ,मेरा अंतर तिमित चिर कर 
छा जाओ मेरे अस्तित्व के आकाश में ,अपना विस्तार लिए 




 


Saturday, 8 October 2016



क्षितीज

क्षितीज से टकरा कर  लौटी  हो  जैसे
आवाज़ दिल की अनुगंज  की तरह ...

Thursday, 29 September 2016



अनुगूँज ..
शब्दों से परे कुछ लम्हे ,कुछ रिश्ते ,कुछ अंश जीवन के
परिभाषाओ की परिधि से परे ,कुछ सच खड़े है मुस्कुराते हुए
बादल का वसुंधरा से नाता देता है नित नया अंकुरण
और धरती तपन से तृप्ति की राह में ओढ़ लेती है धानी चुनर
लहरो का सागर में उमड़ना,फिर सिमट सागर हो जाना
कौन ढूंढता शब्दों को ,जब मन भाये लहरो का गुनगुनाना
भीगती धरती ,उमड़ती लहरे और और चाँद मुस्कुरा रहा
जाने किसकी याद में ,लो दूर पपीहा भी गा रहा
और खड़ी परछाई ने जैसे सच सा कोई पा लिया
तन के आगोश में उसने, खुद को फिर समां लिया
जाने दूर से कहीं आते शब्द गूंज उठे इस तरह
सूरज आता जाता है ,परछाई तो साथ है एक अनुगूँज की तरह......
Vandana Agnihotri

Monday, 12 September 2016



आज चन्द पंत्तियो को सजाया है गुलदान में मित्रो आपके लिए ...


यादें ..
वक़्त तो बादल सा उड़ा चला जाता है
ज़िन्दगी यादो से तरबतर छोड़ कर

सुनहरे पल ..
कलम की स्याही से उतर जाते है कुछ लम्हे
ज़िन्दगी की किताब पर अमिट पहचान लिए

पागलपन ..
मन तो कहता है जो महसूस करता है
लोग पागलपन नाम दें ये और बात  है .

Sunday, 11 September 2016




दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है...

हाँ ,हर एक अँधेरे मोड़ पे 
झांकता सा कोई प्रकाश 
जैसे डूबते  हुए मन में, उभरती हुई आस 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 

चाँद तो है सदियो से  मुस्कुराता यूँ ही 
बस कभी अंधियारी ,कभी उजियारी रात आती है
अँधेरी  गालियाँ,फिर चांदनी में नहाती हैं 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 

जीवन है तो सफर है ,सफर है तो डगर है 
रास्तो से धूप ,कभी छाँव टकराती है 
हमसाया बन ज़िन्दगी ,साथ गुनगुनाती है 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 








दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है...

हाँ ,हर एक अँधेरे मोड़ पे 
झांकता सा कोई प्रकाश 
जैसे डूबते  हुए मन में, उभरती हुई आस 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 

चाँद तो है सदियो से  मुस्कुराता यूँ ही 
बस कभी अंधियारी ,कभी उजियारी रात आती है
अँधेरी  गालियाँ,फिर चांदनी में नहाती हैं 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 

जीवन है तो सफर है ,सफर है तो डगर है 
रास्तो से धूप ,कभी छांव टकराती है 
हमसाया बन ज़िन्दगी ,साथ गुनगुनाती है 
दस्तक उजाले की ,नवजीवन दे जाती है
हाँ है कोई तो शय, जो राह दिखाती है 





Wednesday, 7 September 2016









कुछ भाव समर्पण के ...

कितना व्यापक है आकाश ,
दूर तक पूरी दुनिया खुद में समेटे हुए
हर  शय को दुनिया की प्राण देते हुए 
बस ऐसे ही होते हैं कुछ आयाम जीवन के
खुले उम्मुक्त आसमान सी व्यापकता लेते हुए
संकुचित किसी भी दायरे से परे
बस ,मन वह आकाश हो रहा है 
नैनो का निर्झर ,हर मैल धो रहा है 
हे ईश्वर तुझे शूल नहीं ,फूल चढ़ाने हैं 
मन के इस मंदिर में  ,बस दीप जलाने है 
तिमिर मेरा ,तेरे उजाले में नहायेगा 
वह दिन जीवन में  ,जरूर आएगा 
बस प्रेम तेरा मुझमे, प्राण बन बहने दे
अब तो शरण में तेरी ,यूँ ही रहने दे ...











कुछ भाव समर्पण के ...

कितना व्यापक है आकाश ,
दूर तक पूरी दुनिया खुद में समेटे हुए
हर  शय को दुनिया की प्राण देते हुए 
बस ऐसे ही होते हैं कुछ आयाम जीवन के
खुले उम्मुक्त आसमान सी व्यापकता लेते हुए
संकुचित किसी भी दायरे से परे
बस ,मन वह आकाश हो रहा है 
नैनो का निर्झर ,हर मैल धो रहा है 
हे ईश्वर तुझे शूल नहीं ,फूल चढ़ाने हैं 
मन के इस मंदिर में  ,बस दीप जलाने है 
तिमिर मेरा ,तेरे उजाले में नहायेगा 
वह दिन जीवन में  ,जरूर आएगा 
बस प्रेम तेरा मुझसे, प्राण बन बहने दे
अब तो शरण में तेरी ,यूँ ही रहने दे ...



Sunday, 4 September 2016




एक रास्ता उस चाँद तक...

एक रास्ता कुछ थमता, कुछ चलता सा
 कभी गिरता, कभी सम्हलता सा 
जाता तो है उस चाँद तक 
उस नीले आसमान तक

क्यों होता बैचैन मन 
गिरह  अब तू खोल मन
कभी बहता, कभी जमता सा 
दूर क्षितिज में पिघलता सा 
जाता तो है उस चाँद तक 
उस नीले आसमान तक 

धूप छांव से हैं रास्ते
एक पड़ाव से है रास्ते 
साया जो तेरे साथ है 
हर मंज़िल है तेरे वास्ते 
प्रतिध्वनियों में मचलता सा 
जाता तो है चाँद तक 
उस नीले आसमान तक 

एक रास्ता कुछ थमता, कुछ चलता सा
 कभी गिरता, कभी सम्हलता सा 
जाता तो है उस चाँद तक 
उस नीले आसमान तक

Friday, 12 August 2016



....

 दस्तक .....


धीरे से एक दस्तक ये कैसी है दरवाजे पे आज
कोई आहट सुनी है शायद, कुछ खिलखिलाहट के साथ
धीरे  से पट खोलती वो, बोलती है दरवाजे पे आज
पहचाना, मै तेरी चाह हूँ, एक नयी राह हूँ
तेरा मै हर्ष हूँ, उत्कर्ष हूँ, तेरे साथ हूँ ,आसपास हूँ
तेरी पहली अंगड़ाई में थी, मै तेरी तरुणाई में थी
कभी बिखरी हुई किरणों में ,कभी चांदनी में ,परछाई में थी
मै ज़िंदगी हूँ तेरी, कभी थमती रही कभी बहती रही
छाव देखि साथ ,तो कभी धूप भी सहती रही
उठ अब साथ आ ,मेरे साथ तू भी गुनगुना
देख पंख कुछ परिंदो से चुरा के लाई हूँ
आज देख खुद चलकर, तुझसे मिलने आयी हूँ
चल साथ चल मेरे ,दूर कही किसी राह में.
तू औए मै रहेंगे नील गगन की छाँह में
मै ज़िंदगी तेरी हूँ बस और कोई नहीं...............

Wednesday, 3 August 2016










एहसासों के गलियारों में 

हसासों के गलियारों में 
खूबसूरत से उस गुलदान में 
कुछ गुच्छे भर यादें 
सजाई हैं ,आ जाना 

कुछ  कही, कुछ अनकही
देखो झूलती है लताओं सी
मन की दीवार पर 
कुछ बातें सजाई हैं,आ जाना 

थोड़ी सी ठिठोली गूंजती  
कुछ मीठी बोली गूंजती है 
लम्हो से लम्हे जोड़ उस बंदनवार सी 
कुछ चाहते सजाई हैं ,आ जाना 

वक़्त के झोरोखे से कुछ यादें झाँकती है 
एक मधुर मुस्कान ले 
लुक चिप मुझे ताकती हैं
 मधुमालती सी वो यादें सजाई हैं ,आ जाना 

एहसासों के गलियारों में 
खूबसूरत से उस गुलदान में 
कुछ गुच्छे भर यादें 
सजाई हैं,आ जाना 







Wednesday, 27 July 2016



एक शाम चर्चा ,एक शाम से ...


आज पलटे जब जीवन के पन्ने कुछ
एक शाम साथ चली आयी मेरे 
कुछ नहीं चन्द बातो और चाय की चुस्कियो के बीच पूछा मैंने
याद है तुम्हे
जिस रोज़ तुम जीवन में आयी  थी
कुछ मद्धम सी रौशनी ,कुछ हलकी सी पुरवाई थी
हौले से मुझको जैसे छुआ था तुमने 
घुल गयी थी मेरी साँसों में 
अब तक महकती हो वैसी ही मेरे अहसासों में 
महसूस होता है अब तक, मचलती लहरो का लहरो में खो जाना
विशाल  उस सागर में लिपटकर ,लहरो का जैसे सो जाना 
हाँ याद है मुझको 
जिस रोज़ तुम जीवन में आयी  थी
कुछ मद्धम सी रौशनी ,कुछ हलकी सी पुरवाई थी
पन्नो पे इस तरह अंकित और एक शाम हुई 
कुछ नहीं चन्द बातें और चाय की चुस्कियो के बीच 
पलटे थे कुछ पन्ने मैंने 
पन्ने कुछ जीवन के ....

Saturday, 23 July 2016







मैं खुद के लिए लिखती हूँ ,उस खुदा के लिए लिखती हूँ
एक खूबसूरत सा हिस्सा मेरा ,रह गया था किसी मोड़ पर
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

खूबसूरत सी बनाई है ये दुनिया किसी ने
उस बादल, उस दरिया, उस हवा के लिए लिखती हूँ
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

मदमस्त बहती है मतवाली नदियां जो झूमकर बरसती है काली बदरियां जो
इस गाती ,इस झूमती मदमस्त फ़िज़ा के लिए लिखती हूँ
बस यूँ समझिये, उस गुमशुदा के लिए लिखती हूँ

Friday, 22 July 2016






कुछ लोग निराले होते है
तपती भीषण जलती   गर्मी में
अमलताश का भाव लिए
लाल फूलो से झुके गुलमोहर सा
एक शीतल घनेरी छांव लिए
ठहरी हुई गहरी झील से
कभी प्यार भरी, नदी सा बहाव लिए
कुछ लोग निराले होते है

Tuesday, 19 July 2016





As you begin to walk out on the way

The way appears.

~ Rumi




चल पड़े हैं अब ,तेरी राह में ये ज़िंदगी 
मंज़िल मिल ही जाएगी ,रास्तो की तलाश में

हर मोड़ से झांकते है, वक़्त की मेहराब पे टंगे सपने 
बस ये मोड़ ही आखिरी होगा ,चलते है इस आस में ....

Thursday, 14 July 2016






 एक गुजारिश ढलते दिन से

ये  सुबह  मेरी  ज़िंदगी की ,इससे पहले की दिन ढल जाए और शाम अपनी बाहें फैलाए
थके हुए सब पंक्षी ,करें गमन नीड की ओर
कुछ थम जा, भर लून आँचल में उजाला तेरा
अँधेरी रातो में होगा जो साथ मेरे
उन टिमटिमाते सितारों की तरह
हाँ ,कह दूंगी आसमान से तब मै
एक आकाश मेरा भी है जगमगाता है जो तेरी ही तरह..
ये  सुबह  मेरी  ज़िंदगी की ,इससे पहले की दिन ढल जाए और शाम अपनी बाहें फैलाए
कुछ थम जा ...

Monday, 11 July 2016




टुकड़े भर बादल ,टुकड़े भर धूप है....

कुछ टुकड़े बादल ,कुछ टुकड़े भर धूप है
जीवन का हर दिन ,बदलता सा रूप है 
जिस पल जो मिले, है दोस्ती का वादा 
चल बाँट ले मिलकर ,क्यों न हम आधा आधा 

एक तुडका धूप तेरी, सर्द मौसम में गुदगुदाएगी 
तपती दुपहरी में कभी ,मेरी बारिश तुझे भिगाएगि
जिस पल जो रहे ,इस मौसम का इरादा 
चल बाँट ले मिलकर ,क्यों न हम आधा आधा 

कुछ टुकड़े बादल ,कुछ टुकड़े भर धूप है
जीवन का हर दिन ,बदलता सा रूप है ...

Friday, 8 July 2016

अंत से आरम्भ तक ...


फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है 

हर अंत के बाद नयी  शुरुआत लिखी होती है
हर अमावस के बाद पूनम की रात लिखी 
कड़ी धूप में जब जलती है ये वसुंधरा 
तब किस्मत में उसके  झूमती बरसात लिखी होती है 

फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है 

कौन देता है देखो उगते सूरज को लाली
पक्षियों का ये कलरव, ये भोर निराली 
थाम  ले बढ़कर तू  हाथ उसी का 
जिसने इस सुंदर दुनिया की सौगात लिखी होती है 

फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है ...










अंत से आरम्भ तक ...


फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है 

हर अंत के बाद नयी  शुरुआत लिखी होती है
हर अमावस के बाद पूनम की रात लिखी 
कड़ी धूप में जब जलती है ये वसुंधरा 
तब किस्मत में उसके  झूमती बरसात लिखी होती है 

फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है 

कौन देता है देखो उगते सूरज को लाली
पक्षियों का ये कलरव, ये भोर निराली 
थाम  ले बढ़कर तू  हाथ उसी का 
जिसने इस सूंदर दुनिया की सौगात लिखी होती है 

फूटती हुई नन्ही कोपलों पे ठहरी हुई पानी की बूँद कोई
कानो में उनके  हौले से कुछ कह जाती है 
जैसे आशाओ का नया गीत कोई सुनती है ...










Monday, 4 July 2016




ज़िंदगी का हाथ थामे, भीगी इस रात की गोद में
मलमली सपने ओठ सो जाएँ,
खो जाये ,खुद को एक बार फिर पाने के लिए 
कल आएगी न मुस्कुराती सुबह हमे उठाने के लिए .....

हलकी गिरती फुहारों के  शुभरात्रि दोस्तों ....

Friday, 1 July 2016



हे ईश्वर मेरे ...

देखा है बहुत करीब से तुझे, तेरे अहसास को आसपास अपने 
उस मचलते सागर के ह्रदय में जो ठहराव सा है वो क्या है,तुम ही हो 
उस उमड़ते बादल के सीने से फूटती जलधारा में बस तुम ही हो 
हाँ  वो तुम ही हो ,गहरे बहुत गहरे समाये हुए कण कण में 
इस सुंदर  धरा से उस विशाल फैले नील गगन में 

देखा है बहुत करीब से तुझे, तेरे अहसास को आसपास अपने 
जैसे एक लम्बी तलाश को ,बैचैन करती प्यास को मिल जाती है आस कोई 
वैसे ही समाये हो थिरकती लहरों के स्पंदन में, सागर की गहराई बन 
नाच उठते हो थिरकती बूंदों में, अद्भुत  सतरंगी परछाई बन 
हाँ  वो तुम ही हो ,गहरे बहुत गहरे सागर में छुपी असीम शांति का अहसास लिए 

देखा है बहुत करीब से तुझे, तेरे अहसास को आसपास अपने 
ये ईश्वर मेरे .....







Monday, 30 May 2016


रेत के घरोंदे...


रेत के घरोंदे
छोटी छोटी आशा लिए 
छोटी छोटी उंगलियों से
बनते कभी ढलते रेत के घरोंदे 
वो बचपन के 

शीतल सी गीली रेत पे 
जैसे उभरती सपनो की आकृतियाँ
देख के वो चहकता मन 
लहरों से टकराते सपनो को 
कभी देख कर तरसता मन 
फिर भी नए सपने संजोना 
छोटी छोटी आशा लिए 
छोटी छोटी उंगलियों से
रेत में फिर मासूमियत भिगोना 

नयी उमंग नया उल्लास लिए 
छोटी छोटी आशा लिए 
छोटी छोटी उंगलियों से
बनते कभी ढलते रेत के घरोंदे 
वो बचपन के 

बहुत कुछ सिखाते  से
आशाओ का पाठ पढ़ाते से 
रेत के घरोंदे 

Tuesday, 24 May 2016


ईश्वर 

अनकहे लब्ज़ों और अनखुले लम्हों सी 
अधखिली सी ये गुलाबी पंखुड़ियां 
गुलाबी इस आभा में ओंस बन ठहरा हुआ अहसास तेरा 
ईश्वर  तेरा ठिकाना कहा नहीं है

Saturday, 21 May 2016







घर तो बस घर होता है 

दिन भर कितना  भी उड़े उन्मुक्त पंछी 
ढलती शाम के साथ नीड़ की तलाश होती है 
और बांहे पसारे  इंतज़ार लिए आँखों में 
नीड़  को भी उसके मुस्कराहट भरे चेहरे की आस होती है 

सच ही तो  है प्रकृति भी डोल उठती है 
जब निःशब्दता लिए प्रीतिध्वनियां बोल उठती है 
तभी झांकता है वो चाँद लुक छिप  कर बदलो से 
प्रकृति राज़ जाने कितने  यूँ खोल उठती है 




Sunday, 15 May 2016



गुलमोहर मेरा ...

शीतल सी छाँव तेरी और उसपे झूमकर मुस्कुराना तेरा 
हर पथिक को अहसास यूँ घर का  का दे जाना तेरा 
वह लहराते हुए लबरेज़ फूलों से  झुक जाना तेरा  
धूप में भटके मन को एक ठहराव सा दे जाना तेरा

सच ही है ईश्वर  जाने किस किस रूप में आता है 
कभी आकाश की मेहराब से झांकता चाँद बन मुस्कुराता है
कभी मेरे गुलमोहर सा मदमस्त मगन  लहराता है 
हाँ गाता है साथ मेरे ,मन में कोई गीत बन उभर आता है 





Monday, 9 May 2016




हे राम मेरे ,हे श्याम मेरे .....

जब यू मुझमे मैं बनकर रहते हो 
चंचल से इस निर्झर मन में 
निर्मल सरिता सा बहते हो 
हर अँधेरे में मेरे किरणों सा बहते हो
अब कर लो समाहित स्वयं में 
जिस तरह तिमिर हो निशा का 
खो जाता हर  सुबह व्योम में 
हे राम मेरे ,हे श्याम मेरे .....

अक्षय तृतीया की शुभकामनायें 

Wednesday, 4 May 2016



Bliss 

वह मौन मुस्कुराता सा ...

जब कुछ नहीं रहता बस  वह  रहता है
न मैं  रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है 
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा 

सांसो की लय पे कभी मद्धम सा थिरकता सा
दूर पहाड़ों में  जैसे  बर्फ सा पिघलता सा 
न मैं  रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है 
अंतस से अनन्त में  समाता  हुआ वह मौन मुस्कुराता सा 

जब कुछ नहीं रहता बस  वह  रहता है
न मैं  रहता ,न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है 
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा 

मन की लहरों को सागर में उड़ेलता सा 
ढलते सूरज सा आकाश में लालिमा उकेरता सा 
न मैं  रहता न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है 
रात बन भोर की आगोश में सिमटता वह मौन मुस्कुराता सा 

जब कुछ नहीं रहता बस  वह  रहता है
न मैं  रहता ,न तू रहता है , दूर तलक बस वह रहता है 
निःशब्दता में समाते हुए शब्द लिए वह मौन मुस्कुराता सा 

Tuesday, 3 May 2016






वक़्त ..

वक़्त कभी थमता कभी भागता सा 
वक़्त कभी सोया कभी जागता सा 
वक़्त  चल रहा है ,हर पल बदल रहा है 
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है 

किसी के लिए उचाइयां लिए 
कहीं मन में गहराइयाँ लिए 
मुठ्ठी में भरी रेंत सा हर पल फिसल रहा है 
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है 

वक़्त कभी थमता, कभी भागता सा 
वक़्त कभी सोया, कभी जगता सा 
वक़्त  चल रहा है ,हर पल बदल रहा है 
मोम की लौ सा हर पल जल रहा है 

Monday, 18 April 2016





दुनिया अनोखी सी...

जाने किस दुनिया में पलती है
कुछ तेरे भीतर, कुछ मेरे अंदर चलती है

दूर इस दुनिया से, एक दुनिया अनोखी सी
जीवन से लबरेज़ ,जीवन बन ढलती है 

न सपनो के पास ,ना हकीकत के करीब
कुछ अधखुली नींद सी, आँखों में मचलती है 

समय की परिधि पे टंगी  ,उस खिड़की के पार
दूर उस क्षितिज पर ,लालिमा बन उभरती है 

दूर इस दुनिया से, एक दुनिया अनोखी सी
जीवन से लबरेज़ ,जीवन बन ढलती है 

Friday, 15 April 2016

 








ज़िंदगी एक सौगात सी है ..

ज़िंदगी इस रात सी है ज़िंदगी इस बात सी है  
खुद से खुद की अधूरी मुलाकात सी है 

कुछ जलते उजाले इसमें , कुछ ढलते अँधेरे है
ढूंढा तो पाया ,ज़िंदगी एक सौगात सी है 

बहती इस रात  के आर है क्या और पार है क्या 
कुछ उलझते जवाब है ,कुछ सुलझते सवालात सी है  

छू गया हो चाँद जैसे ,हौले से हंसकर  इसे 
उतरती हुई चांदनी में ,मचलते जज्बात सी है 

ज़िंदगी इस रात सी है ज़िंदगी इस बात सी है  
खुद से खुद की अधूरी मुलाकात सी है 

Tuesday, 5 April 2016



खोये कहाँ थे रूठे हुए वो शब्द मेरे
सितारों की चादर तले ,चांदनी लिबास में
मिल गए टिमटिमाते जुगनुओ से
मुस्कुराते हुए ,फिर वो शब्द मेरे

बिखरी हुई कुछ पंक्तियाँ तकती रही
अधूरी कई कहानियां मौन सी जगती रही
खोती रही हो जैसे ,अर्थ सा ये लेखनी
पन्नो को सजाते लो खिल गए ,फिर शब्द मेरे

संग जिनके नापी थी ,दूरियां आसमान की
उतारी थी कहानियां संग पंछियो के उड़ान की
मिटटी की भीनी सुआस लिए रिमझिम फुहार से
भीगे हुए अहसास लिए मिल गए फिर शब्द

Thursday, 31 March 2016





फिर एक चिराग जला लो ...

लो चल पड़ी है रात फिर
फिर एक चिराग जला लो
कुछ टुकड़े चाँद से चुरा लो और
कुछ  दिल के अरमान जला लो



अँधेरे में लिपटी सी इस रात को
एक मद्धम सी  रोशनी काफी है
आसमान में खुलती खिड़कियों को
बस एक थमीं सी जमीन काफी है

लो चल पड़ी है रात फिर
फिर एक चिराग जला लो
कुछ टुकड़े चाँद से चुरा लो और
कुछ दिल के अरमान जला लो

झरोखे से टपकती है वह शीतल सी चांदनी
ओढ़ कर इसको चलो खुद में समां लो
वो सींके पे टंगा कोई सपना टिमटिमाता मेरा 
चिराग के लौ से उसकी ताल फिर  मिला लो 


लो चल पड़ी है रात फिर
फिर एक चिराग जला लो
कुछ टुकड़े चाँद से चुरा लो और
दिल के कुछ अरमान जला लो









वक़्त के गुलदान में आज एक और गुलाब सजा लें चलो 
एक और सुबह अपनी सी मिली वक़्त को अपना बन लें चलो 

Saturday, 26 March 2016



सोंधी सी महक ज़िंदगी की .....

ऐ ज़िंदगी जब भी पलटा कोई पन्ना तेरा 
कोई भीनी सी महक से भीगता सा है मन मेरा  

कुछ यादो की महक, कुछ इरादों की महक
किसी पन्ने से टपकती है ,खुद से किये वादों की महक

कहीं किसी हासिये पे ,दर्ज़ तारीखों की फेहरिस्त
तो कही चुपके से झांकती दबी चाहतो की फेहरिस्त

किसी पन्ने पे मुस्कुराती सी , वो आखिरी लकीर
जैसे खींची हो वक़्त ने ,कोई मनचाही सी तस्वीर 

वो बड़े प्यार से उकेरा हुआ ,कोई लम्हा पुकारता सा
वो कहीं खामोश सा उदास ,कोई पल निहारता सा 

हर पन्ना गुजर जाता है लो, वक़्त का हस्ताक्षर लिए 
 हासिये पे खड़े सोचते हम ,क्या ये सब लम्हे हमने जिए 

और तोड़ती है जैसे ,गहरी तन्द्रा मेरी
वही एक भीनी सी , बड़ी अपनी सी महक तेरी

लो जुड़ गया आज का एक और  नया पन्ना तुझमे 
कोई  सोंधी सी महक  ,जगाता सा मुझमे ................ऐ ज़िंदगी 


Wednesday, 2 March 2016





क्या लिखूं ?

क्या लिखूं ?
हाँ ,कभी शून्य सा सवाल ताकता है
कुछ आतुर सा ,पन्नो के आर-पार
निःशब्दता में कुछ शब्दों की तलाश लिए

हाँ ,क्या लिखूं ?
क्या लिखूं उन आँखों पर
जिनकी पलकों में टाँगे ,है कुछ सपने
कुछ तेरे से ,कुछ मेरे अपने

हाँ , क्या लिखूं ?
क्या लिखूं उन मुस्कुराहटों पर
झरती है रौशनी जिनसे बिखरती सी
गुजर जाती है अंधेरो को मेरे चीरती सी

हाँ .क्या लिखूं ?
क्या लिखूं, उन बातों पर
पा जाती हर भटकन मेरी एक रास्ता सा
और हर शब्द जैसे मुझे तलाशता सा

क्या लिखूं ?
हाँ ,कभी शून्य सा सवाल ताकता है
कुछ आतुर सा ,पन्नो के आर-पार
निःशब्दता में कुछ शब्दों की तलाश लिए ...



कुछ छूकर जाती पुरवाइयों में 
कुछ मौन से इस मन की गहराइयों में 
ढूंढतें है तुझे, ये ज़िंदगी 
बसंत से महकी हुई अमराइयों में

दूर बादलो की उकेरी लकीरो में 
कुछ धुप सी कुछ छाँव सी तकदीरों में 
ढूंढतें है तुझे ,ये ज़िंदगी 
अनोखी इस दुनिया की तस्वीरों में

दिन और रात के ढलते अंदाज़ में 
कोयल की उस सुरीली आवाज़ में 
ढूंढतें है तुझे ,ये ज़िंदगी
हर सरगम में हर साज़ में

कुछ छूकर जाती पुरवाइयों में 
कुछ मौन से इस मन की गहराइयों में 
ढूंढतें है तुझे ,ये ज़िंदगी 
बसंत से महकी हुई अमराइयों में 

Friday, 26 February 2016



सुना है समुन्दर का स्वाद खारा है
पर तुझमे जितना डूबता है मन ,मिठास बढ़ती जाती है....



Wednesday, 24 February 2016





मौन सा ईश्वर मेरा ....

एक सुन्दर आभास सा होना तेरा और
ढल जाना अपरिभाषित अनुभूति में करीने से
परिभाषाओ में बंधते कहा है, ये धरती ये अम्बर
ये बदलो में छुपता चाँद ये,ये नीला सागर
मौन सा पिघता अहसास तेरा, बर्फीली शृंखलाओं में
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
 हाँ पास ही तो हो ,मुझे छूती हवाओ में
कभी ढलती शाम के मंज़र में 
कभी सर्द- गर्म रातो की बदलती अदाओ में
बिखर जाते हो लालिमा लिए रोज़ सुबह जीवन में 
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
एक मौन बन समाएं हो मेरे अस्तित्व से अनंत तक
गूंजते हो  हर क्षण प्रतिध्वनियों की श्रृंखलाओं में 
और ढूंढती है नज़र तुझे ,जाने क्यों इधर उधर 
एक सुन्दर आभास सा होना तेरा और
ढल जाना अपरिभाषित अनुभूति में करीने से
हां यही,बस  यही तो एक सच है नितांत सत्य 
तुम हो ,तुम ही तो हो इस अंत से अनत तक 
अपनी मौन सी  बाहें फैलाये मुझे पुकारते से 
बस मेरी  ही तरह ...