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Tuesday, 11 August 2015




यादें.......

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,ये काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज ,कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते है

समय फिसलता है जब ,मुट्ठी से  रेत बन
यादों के झोंके तब मन को सहलाते  हैं
जीवन के सफर के लम्बे  हैं रास्ते 
कभी साथ है कारवां ,कभी साथ सिर्फ रास्ते 
पगडंडियों में भटकते ,अकेले जब हम फिरें 
यादो के ये साये ,हमसफ़र बन जाते हैं

चलते हुआ जाना है ,रास्तो से  ये सीख ली
चाहतो से न भाग तू ,ना यादों से  हाँथ छुड़ा
जीवन में जब तक सांसों का ताना बाना है
हर नए मोड़ पर,
नयी यादों का ठिकाना है 

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते हैं


Saturday, 8 August 2015


वक़्त 

आज दो अलग - अलग रचनाएँ वक़्त पर ,आज दो अलग अलग वक़्त में लिखी हुई क्योकि वक़्त के साथ पता चला रचनाएँ वक़्त नहीं देखती आकार लेने के लिए......


मद्धम है सांसो की धुन
मद्धम दिल की सरगम 
लम्हा ये रुका हुआ 
मुस्कुरा रहा है क्यों छिप छिप कर
वक़्त के दामन में छुपा क्या है किसे पता
वक़्त ही जानता है वक़्त के राज़ कई...


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अंदाज़ देखा आज वक़्त का कुछ इस तरह 
अँधेरी राहो पे भी जाने कोई दीप जलाता तो है
नज़र आये न आए ,ये और  बात है 
पर छुपा हुआ सा वो ,खुदा कहलाता तो है 

तपती धूप में जब तपाती है हमे ज़िंदगी 
साया बन वो खुदा  साथ आता तो है 
परिधि में  बंधी घसीटती है  जब ज़िंदगी 
दूर आसमाँ से कोई खुला ,आसमाँ दिखता तो है

ज़िंदगी का समीकररण कुछ अजीब है दोस्तों
त्रिज्याओ को नापते गुज़ार देते है वक़्त हम
और वक़्त ही सिखलाता जाता  है एक दिन
परिधि खूबसूरत सा बस वहम् है ज़िंदगी का 
जिसमे खुद को खुद ही हम बिठाते तो है

वक़्त से लड़कर जो वक़्त से पार निकल गए 
देखी तो उन्होंने भी होगी कभी हँसी,कभी नमी 
यही आसमाँ ,यही जमीं ,यही दुनियाँ ,यही कमी
पर कुछ तो जज्बा कुछ अहसास  उनमे था 
रास्तो पे आज उनके निशाँ ,नज़र आते तो है




Thursday, 6 August 2015

मुलायम सी शाम 

ढलते सूरज का मुलायम सा अहसास ,
लहरो की कलकल और ये अहसासवक़्त काश थम जाए यहीं और 
समां जाए हम आगोश में ज़िंदगी के साँसों का क्या है ,कल हो न हो 
पल जो है अभी वो पल हो न हो ठंडे से झोके की थपकियों में सोने दोनींद बहुत आ रही है ,बस यही अब सोने दो ,खोने दो फिर से एक बार ,अपनी तलाश में ज़िंदगी,नई आस लिए ....
    रूपांतरण

यह एक बहुत ही सुन्दर तस्वीर मिली आज यूँ  ही भटकते हुए. अपने आप में कितना गहरा अर्थ लिए है ये एक चित्र ,जलती हुई तीली  और खिलता हुआ कमल . कितना गहरा राज़ जीवन की सार्थकता का .जीवन ,हाँ हर दिन मोम की तरह पिघलता हुआ जीवन ,और हम सभी  किस रूप में  इसे  लेते हैं यही  दृषिकोण निर्धारित  करता  है की हमने  जीवन को सिर्फ  काटा  है या जीवन को  जिया भी  है. सब  दृष्टिकोण की बात  है कि हम क्या होना पसंद करते है ,इस जलती हुई तीली से निकलता हुआ  काला गहरा धुँआ या इस जलन में भी हम कल्पना कर सकते है उस धुएं के एक कमल में रूपांतरण की .हर दिन हमे कोई सीख दे कर जाता हैं मैंने तो पा ली आज की शिक्षा आप क्या सोचते हैं इस विषय में .मै प्रयासरत हूँ .हाँ , प्रयासरत क्योकि सीखना एक अविरल और निरंतर प्रक्रिया हैं बहती हुई नदी की तरह , इस चिंतन के साथ 

शुभ रात्रि 

Monday, 3 August 2015

         श्रावण मास 


सावन वह मास जब अपने सुन्दरतम रूप में खिल उठती है धरती ,चारो और फैली हरियाली की चुनर ओढ़ कर..सावन से  शुरू होता है फिर से त्योहारो का सिलसिला ,गांव में आज भी पड़ जाते हैं  सावन के झूले उल्लास के प्रतीक के रूप में. शिव का अतिप्रिय मास सावन, जिसका उत्साह हमे दिखाई देता है उन कावड़ियों के समूह में जो चले जाते है बम भोले रटते  हुए कठिन राहो  पर  बेपरवाह मस्त होकर शिव के रंग में रंगे हुए .
     हमारी संस्कृति में हर मास ,हर त्यौहार प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है जिसके पीछे के गहरे चिंतन की समझ खो दी है हमने वक़्त के साथ .सावन प्रतीक है उस विश्वास का ,आस्था का कि हर एक कठिन दौरके बाद आगमन होता है सरलता का ,तपन के बाद शीतलता का ,अगर प्यास है तो तृप्ति भी होगी ,बस पूरी आस्था के साथ चलते जाना है हमे ऊंचीं  नीची पगडंडियों पर जीवन की उन कावड़ियों की तरह गाते गुनगुनाते हुए .माना की ये सब शब्द लिखना आसान है ,रास्ते आसान नहीं पर पर ईश्वर ने हमे क्षमता तो दी है चलते की ,और इसलिए दिए है प्रतीक के रूप में इतने त्यौहार ,इतने वार ,इतने अलग अलग प्रकृति वाले मौसम कभी तपिश ,कभी ठिठुरन ,कभी मद बरसाता मधुमास कभी झूला झूलता सावन  और साथ में हर मौसम से जुड़े व्रत त्यौहार जिनसे आता  है जीवन में आत्म- संयम ,अनुशासन जिनके द्वारा हर मौसम के अनुरूप हम ढल  जाये आसानी से सहज रूप में  प्रकृति के साथ तारतम्य बनाते हुए .
    
सावन के प्रथम सोमवार की बधाई स्वीकार करें .

Thursday, 30 July 2015

कृष्णं वन्दे जगत गुरुम ...



गुरुपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाये .इस  अवसर पर अपने माता -पिता एवं गुरुजनो तो प्रमाण कर कुछ विचार अपने  कृष्ण को अर्पित करती हूँ .कृष्ण पता नहीं क्यों रोम रोम में रमता है ये नाम .पुरुषोत्तम है जो नाम से ,अपने ज्ञान से और अपने कर्म से .परमात्मा जो पूर्णता की पराकाष्ठा है ,परमात्मा  जो निराकार है ,फिर भी उसने स्वीकार किया साकार होना सिर्फ प्रेम के कारण ,क्योकि हम वो मानते है जो हमे दिखाई देता है ,हर किसी के पास ज्ञान चक्षु जागृत नहीं होता .अपने ईश्वरीय गुरुता का त्याग कर प्रेम स्वीकारता  कृष्ण ,संसार को अपने इशारो पे नाचने वाला परमात्मा गोपियों के लिए गोपियों के साथ स्वयं को विलीन कर नाचता कृष्ण .
                              राधा-कृष्ण  परम प्रेम की पराकाष्ठा, सच्चे पेम की अद्भुत उपमा ,प्रेम और ज्ञान का अवर्णनीय संगम.क्या है परम प्रेम ?स्वयं की अंत से अनंत होने की यात्रा. हर  एक अपूर्णता से गुजरकर पूर्णता को प्राप्त होती अनुभूति प्रेम  है .वह यात्रा  जिसका अंतिम पड़ाव आत्म ज्ञान है.जो जगत का गुरु है ,जो स्वयं हर ज्ञानियो का ज्ञान है ,जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना  शेष नहीं ,उसने स्वीकारा है प्रेम में विलय होना ,जो मुक्त है इस सांसारिक अनुभवों से ,उसने स्वीकारा है स्वयं को प्रेम की डोर से बांधना  उस बंधन में जिसमे कोई बंधन वास्तविक रूप से है नहीं क्योकि गीता हमे सिखाती  है आत्मा हर बंधन से मुक्त है फिर भी जिसमे आत्मा एक हो जाती है ,एक अनदेखे कोमल डोर से बंधी हुई 
        ज्ञान तो था ,उस उद्धव को बहुत ज्ञान था ,इसलिए वो कृष्ण के इतने समीप था ,पर गोपियों से मिलते ही स्तब्ध रह गया ज्ञान उसका ,मौन रह गया अभिमान उसका , और लौट  कर आया वह तो भीग चुका था  कृष्ण  प्रेम में पूर्णतः , क्योकि देखी थी उसने पराकाष्ठा प्रेम की जिसमे राधा में कृष्ण को पाया था उसने, और हर गोपी में कृष्ण नज़र आया था उसे ..कृष्ण ने कहा था तब ,इस प्रेम में नहाये बिना तुम्हारा ज्ञान अधूरा रह जाता इसलिए भेजा था मैंने तुम्हे .
      सच्चा -प्रेम ,जिसमे सच (ज्ञान) भी है और प्रेम भी है ,बराबर अनुपात में ,आवश्यक रूप से क्योकि प्रेम से हम प्रेम को कैसे अलग कर सकते है  ज्ञान की खोज में .ईश्वरीय गुणों का मानवीय गुणों में पूर्णतः विलय, यही सीखा गया वो ,हँसता नाचता ,खेलता ,माखन के रूप में ह्रदय चुराता और साथ ही कुरुक्षेत्र के विहंगम दृश्य में भी गीता का ज्ञान बताता वह परमात्मा .आज फिर से आवश्कयता है उस गुरु की इस असंतुलित होते संसार को .आ जाओ कृष्ण फिर से परम  प्रेम की सरिता बहाने ,ज्ञान के उजाले बिखेरने .प्रतीक्षारत है नयन हमारे .
            श्री कृष्णः शरणम् ममः 

एक भजन की कुछ पंक्तियों के साथ एक बार फिर गुरुपूर्णिमा की बधाई स्वीकार करें

मुरलीवाले तुम कित धाए तेरी राधा करे पुकार हो ,घर आओ मेरे सावरियाँ,
बाल  तरस रहे ग्वाल तरस रहे ,तरसे सब ब्रजनारी रामा  तरसे सब ब्रज नारी
प्रीत लगा के ओ मनमोहन कैसी सूरत बिसारी रामा कैसी सूरत बिसारी
आ भी जाओ, आकर देखो ब्रज का है बुरा हाल हो .कौन बजाये अब बसुरियां 

अपने भागवत  गुरु पूजनीय  स्वामी अवधेशानन्द जी एवं अपने परम गुरु शिव योगी पूजनीय शिवानंद जी और मेरे कृष्ण के चरणो में वंदन  वंदना का .


Friday, 24 July 2015





















बाहें पसारे आज के सफर का ,कर दिया आगाज़ मैंने
देखते है ज़िंदगी आज ,तेरा दिल बड़ा है या दामन मेरा .....

सुप्रभात
हर दिन एक नया दिन ,एक नयी यात्रा, नयी चुनौतियाँ राह की ,गुजरना है हँसते हुए जीवन की गोद में छुपे हुए मोतियों की खोज में,रात में जब नींद की बाँहों में सोने जाये हम तब  अवश्य गिने हमने  क्या दिया आज  जीवन को और आज हमने क्या पाया जीवन से. कभी कम, कभी ज्यादा ,हम दे पातें हैं जीवन को,पर ज़िंदगी हर दिन हमे बहुत कुछ दे जाती है.बटोर ले जीवन के हर उपहार को इस संकल्प के साथ  कि कल और बेहतर स्वयं को बनाना है हमे, एक सच्चे पथिक कि तरह .