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Thursday, 6 August 2015

मुलायम सी शाम 

ढलते सूरज का मुलायम सा अहसास ,
लहरो की कलकल और ये अहसासवक़्त काश थम जाए यहीं और 
समां जाए हम आगोश में ज़िंदगी के साँसों का क्या है ,कल हो न हो 
पल जो है अभी वो पल हो न हो ठंडे से झोके की थपकियों में सोने दोनींद बहुत आ रही है ,बस यही अब सोने दो ,खोने दो फिर से एक बार ,अपनी तलाश में ज़िंदगी,नई आस लिए ....

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