वक़्त
आज दो अलग - अलग रचनाएँ वक़्त पर ,आज दो अलग अलग वक़्त में लिखी हुई क्योकि वक़्त के साथ पता चला रचनाएँ वक़्त नहीं देखती आकार लेने के लिए......मद्धम है सांसो की धुन
मद्धम दिल की सरगम
लम्हा ये रुका हुआ
मुस्कुरा रहा है क्यों छिप छिप कर
वक़्त के दामन में छुपा क्या है किसे पता
वक़्त ही जानता है वक़्त के राज़ कई...
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अंदाज़ देखा आज वक़्त का कुछ इस तरह
अँधेरी राहो पे भी जाने कोई दीप जलाता तो है
नज़र आये न आए ,ये और बात है
पर छुपा हुआ सा वो ,खुदा कहलाता तो है
तपती धूप में जब तपाती है हमे ज़िंदगी
साया बन वो खुदा साथ आता तो है
परिधि में बंधी घसीटती है जब ज़िंदगी
दूर आसमाँ से कोई खुला ,आसमाँ दिखता तो है
ज़िंदगी का समीकररण कुछ अजीब है दोस्तों
त्रिज्याओ को नापते गुज़ार देते है वक़्त हम
और वक़्त ही सिखलाता जाता है एक दिन
परिधि खूबसूरत सा बस वहम् है ज़िंदगी का
जिसमे खुद को खुद ही हम बिठाते तो है
वक़्त से लड़कर जो वक़्त से पार निकल गए
देखी तो उन्होंने भी होगी कभी हँसी,कभी नमी
यही आसमाँ ,यही जमीं ,यही दुनियाँ ,यही कमी
पर कुछ तो जज्बा कुछ अहसास उनमे था
रास्तो पे आज उनके निशाँ ,नज़र आते तो है
bahut sundar ...वक़्त से लड़कर जो वक़्त से पार निकल गए
ReplyDeleteदेखी तो उन्होंने भी होगी कभी हँसी,कभी नमी
यही आसमाँ ,यही जमीं ,यही दुनियाँ ,यही कमी
पर कुछ तो जज्बा कुछ अहसास उनमे था
रास्तो पे आज उनके निशाँ ,नज़र आते तो है
आभार उपासना जी
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