Pages

Sunday, 6 September 2015


कभी महसूस किया है ,फूलो की छुअन
हौले से टकराते उनके मुलायम से अहसाह को
वह रंगो का चटक अंदाज़ ,कहता क्या है सुनो कभी

सुना है ,हौले से पंखुड़ियों का खिलना
कुछ सकुचाते कुछ इठलाते संगीत का हवा में घुलना
मद्धम सी सांसो की लय पे नाचता है जैसे
हर सुबह ,हर फूल  का वो चमन में खिलना

हाँ मैंने महसूस किया है ,उस हवा को
उस बयार को ,गुंजन के उस प्यार को
कलियों से उनके मनुहार को ,
हाँ किया है महसूस मैंने ,चमन से आती हर एक बयार को
सिमट जाता है मन ,सपना लिए खुलते फूलो को निहारने की आस लिए



Friday, 4 September 2015


कृष्ण  कृष्ण कृष्ण ..
कृष्ण के प्रेम में जिस दिन कृष्ण हो जाऊं उस दिन जीवन सफल ,बहुत कठिन है डगर पनघट की पर कृष्ण प्रेम उससे ज्यादा प्रबल हो आज के दिन यही प्रार्थना है मेरे कृष्ण से ...

तू चोर भी है ,पर चितचोर भी 
इस ओर कभी उस ओर भी है 
ढूंढे से मिलता नहीं क्यों ,
छिपता है पर चहुंओर भी है 
तैरता है जो नैनो में नीर
उठती है जो मन में पीर 
बसता है तू उसमे भी 
तू  राधा की धीर में है 
खेले आँख मिचौली नटखट
इस धड़कन से उस पनघट तक 
मेरे गीत में है  ,संगीत में है
जीवन की हर रीत में है
खिलखिलाहटों में बसता है तू ही
मेरी हार में तू ,मेरी जीत में है 
छुपता है पर छुपेगा कब तक 
हर स्वासो से निःश्वासो के बीच
बंधी हुई हर रीत में है 

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें 

Friday, 28 August 2015



अहसास भीगे भीगे से

छेड़ी है सरगम कुछ रात की तन्हाइयो ने 
खो रहा है चाँद क्यों बादलो की परछाइयों में 
फूटती चांदनी लेकिन कर रही है चुगलियाँ
कुछ फुसफुसाहट बिखेरती है ये बिज़लियाँ 
सुर से सुर मिला ले ये सोचते है हम खड़े  
लो एक और नयी धुन ,सुबह के इंतज़ार में है.... 
टपक रहे हैं चांदनी से ,अहसास कई देखो न 
और भीग चले है शब्द मेरे ,चांदनी में नहाये हुए....

Monday, 24 August 2015


एक और सावन बीता...
एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा ,कुछ रह गया रीता-रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई  ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता
पर मंजिलो की तलाश दौड़ती रही ,कभी रूकती ,कभी चलती 
गिरती राहो पे ,कभी ख्वाबो के पर बुनती ,घुनती कभी  तलाशती 
नटखट कभी ,उदास सी ,सावन में भीगे रास्तो में एक गीले अहसास सी 
ज़िंदगी एक और कदम आगे ,कभी जीते विश्वास तो कभी भरम आगे 
तपिश में पड़ती ओस की बूंदो सी उड़ती रही ये ज़िंदगी 
और एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा कुछ रह गया रीता रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता 
एक और हाँ एक और सावन बीता ,भीगी सी यादें ,कुछ टपकते अहसास देकर...

Saturday, 22 August 2015


एक अभिनन्दन पत्र आप सभी मित्रो के नाम ,अवश्य पढ़े...
जीवन : निर्झर से सरिता होने की यात्रा है..


निर्झर लेखनी एक प्रयास है पूर्णता नहीं.निर्झर लेखनी एक निरंतर प्रक्रिया है  सीखने की , प्रतिदिन जीवन से, आस पास की घटित घटनाओ से ,दूसरो के जीवन से ,मन में हिलोरे लेती भावनाओ से ,तो कभी दिमाग में बादलो की तरह घुमड़ते विचारो से ,उन्हें पहचानने की ,समझने की और और मन की परिपाटी में मंथन कर उसमे से सीख रुपी अमृत को आत्मसात कर जीवन में उतारने की ताकि एक दिन बन जाये जीवन बहती हुई नदी की तरह शांत सुरम्य  और अपने अंदर पड़े सभी पथरो ,मिटटी ,कंकड़ो से ऊपर उठ निर्मल जल की धारा के रूप में परिणित . 
     पर उस शांत नदी के बहाव में बदलने के पहले गुजरना होता है निर्झर को ,ऊँचे नीचे चट्टानों से ,उठते ,गिरते रास्तो से तब कही निर्झर बदलता है एक समलत पे बहती धारा के रूप में शांत ,सुरम्य गहराई लिए निर्मल और निश्छल.

वही जल ,वही उद्गम है निर्झर और सरिता का एक,पर एक ही यात्रा के दो भिन्न पहलू  ,जीवन यात्रा के दो अलग -अलग स्तर  को दर्शाते जिनका उद्देश्य एक ही है सागर की ओर गमन.उसी तरह हम सब एक ही स्त्रोत्र से निकल कर  एक ही यात्रा के सहभागी है.
   
मै आभारी हूँ अपने मित्रो का जिन्होंने मुझे कदम कदम पर ये बताया की किस तरह आगे बढ़ने के लिए  अपनी लेखनी को और गहराई में ढालने के लिए सुधार की आवश्यकता है. आभारी हूँ मेरी सखी का जिसने कुछ दिनों पहले मुझे बताया की कुछ बात है जो पहले जैसे नहीं मन को छू रही है लेखनी मेरी. मैंने अपनी हर पोस्ट पे यही लिखा है मै प्रयासरत हूँ  क्योकि सीखना एक निरंतर प्रक्रिया है अंत तक हमे हर दिन हर पल सीखना है.
  मेरी रचनाओ के साथ पूर्णतः ईमानदारी करने की चेष्टा होती है मेरी ,जो महसूस कर पाती हूँ अपने आस पास के वातावरण से ,अपने जीवन से मित्रो के जीवन से वही ढालने का प्रयास होता है मेरा और हमेशा रहेगा .ह्रदय से आमंत्रित है आप सबके विचार ,आप सब  का प्यार ,आप सब की प्रेरणा जो मुझे रोज़ आगे बढ़ाती है एक कदम और निर्झर से नदी बनने की प्रक्रिया में . मेरा सौभाग्य जो इतने सच्चे और अच्छे मित्रो का साथ ईश्वर ने दिया मुझे .ह्रदय से पूरी प्रसन्नता के साथ अभिनन्दन. 

Tuesday, 18 August 2015



शब्द :कुछ अहसासों से तरबतर

ब्द ,हाँ शब्द जाने कभी अटखेलियां खेलते से क्यों है
पकड़ो तो  पकड़ आते नहीं दौड़ते है बच्चो सा, आँख मिचोलियाँ खेलते क्यों है
लो लपक कर पकड़ा एक शब्द मैंने,दुबका हुआ था भीगा सा
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
पहचान मेरी क्या ये सोचती  क्यों हो , मै तो बेरंग हूँ ,बेनाम हूँ ,अनजान हूँ
पानी में पानी बन मिल जाऊंगा ,हवाओं से जोड़ो मुझे खुशबुएँ बिखराऊंगा
उमंगो से रंगो या आंसुओ के छींटे दो  ,जिस  अहसास में ढालो मै उसमे रंग जाऊंगा 
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
मै सोच में हूँ क्या रंग दूँ,हंसी से जोड़ दूँ ,या दर्द  का उसे संग दूँ
इंतज़ार ढालू पन्नो पे ,या एतबार की लकीरे उकेरूँ 
सोचती भर दूँ रंग चकोर की प्यास का ,या बिखेरूं रंग उसके विश्वास का 
आस्थाओं की खुशबुएँ हवाओ में घोल दूँ ,दिल से छलकता जो क्या वो मधुरस घोल दूँ
उड़ेल दूँ  कोमल से सुन्दर से अहसासों को,पिघलने दूँ मौन अब शब्दों में मोम बन
भर लिया अंक में तरबतर उस शब्द को ,और देखो भीगा गया वो एक पन्ना आज फिर आँचल की तरह...

Sunday, 16 August 2015




खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
निर्झरो ने छेड़ी देखो ये कैसे रागिनी है
झूमते है बादल भी ,इठलाती इस चांदनी में
फूटती है रौशनी ,छीनी सी एक रंध से भी
लुक चिप ले चाहे ,चाँद कितना भी ओट में

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
मद्धम सा बहना ,फिर मद्धम में मिल जाना
खिल जाना जैसे हौले से ,एक गुलाब का खुल जाना
कोमल सा अहसास ,हवाओ में जैसे घुल जाना

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत
नीली सी चांदनी में  नहा गया मन आज भी
और सुखी रह गयी,फिर भी आस कई ...