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Friday, 28 August 2015



अहसास भीगे भीगे से

छेड़ी है सरगम कुछ रात की तन्हाइयो ने 
खो रहा है चाँद क्यों बादलो की परछाइयों में 
फूटती चांदनी लेकिन कर रही है चुगलियाँ
कुछ फुसफुसाहट बिखेरती है ये बिज़लियाँ 
सुर से सुर मिला ले ये सोचते है हम खड़े  
लो एक और नयी धुन ,सुबह के इंतज़ार में है.... 
टपक रहे हैं चांदनी से ,अहसास कई देखो न 
और भीग चले है शब्द मेरे ,चांदनी में नहाये हुए....

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