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Monday, 24 August 2015


एक और सावन बीता...
एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा ,कुछ रह गया रीता-रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई  ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता
पर मंजिलो की तलाश दौड़ती रही ,कभी रूकती ,कभी चलती 
गिरती राहो पे ,कभी ख्वाबो के पर बुनती ,घुनती कभी  तलाशती 
नटखट कभी ,उदास सी ,सावन में भीगे रास्तो में एक गीले अहसास सी 
ज़िंदगी एक और कदम आगे ,कभी जीते विश्वास तो कभी भरम आगे 
तपिश में पड़ती ओस की बूंदो सी उड़ती रही ये ज़िंदगी 
और एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा कुछ रह गया रीता रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता 
एक और हाँ एक और सावन बीता ,भीगी सी यादें ,कुछ टपकते अहसास देकर...

2 comments:

  1. Mujhe saawan baarish ki kavita bahut acchi lagti hai. Thanks for this.

    Ek suggestion chhota sa. Aap paragraph ko alag-alag karo isse kavita ko padhana aur aasaan ho jaayega

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  2. Thanks for suggestion Antas, mai jaroor dhyan rakhungi

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