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Sunday, 16 August 2015




खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
निर्झरो ने छेड़ी देखो ये कैसे रागिनी है
झूमते है बादल भी ,इठलाती इस चांदनी में
फूटती है रौशनी ,छीनी सी एक रंध से भी
लुक चिप ले चाहे ,चाँद कितना भी ओट में

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
मद्धम सा बहना ,फिर मद्धम में मिल जाना
खिल जाना जैसे हौले से ,एक गुलाब का खुल जाना
कोमल सा अहसास ,हवाओ में जैसे घुल जाना

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत
नीली सी चांदनी में  नहा गया मन आज भी
और सुखी रह गयी,फिर भी आस कई ...



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