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Friday, 11 September 2015



इंतज़ार

इंतज़ार ढल जाता है,
सुबह का, शाम बनकर
गहराती है जब लालिमा 
दूर क्षितिज पर ,मद्धम होती रौशनी में  
हाँ वही पर तभी दुबक जाता है 
मन के किसी कोने में ,ओढ़ कर अँधेरा
फिर एक सवेरा होने की चाहत लिए,इंतज़ार एक इंतज़ार बन 

पर रुकता  नहीं जीवन का फेरा 
फिर वो तेरा हो, या  हो मेरा 
जीवन तो चलता रहता है
रोज़ यू ही ढलता रहता है 
सुबह से शाम बन ,
रोज़ एक नयी सुबह का सपना संजोये 

सपने , हाँ सपने जो हम देखते है खुद के लिए
इक उम्र ज़िंदगी की,ढल जाने के बाद 
लगता यू है की ,की सपना ही सच है जिंदगी का 
और टांक देता है मन,आकाश में तारे बना सपनो को 
और शेष रह जाता है फिर इंतज़ार कुछ ऊंघता हुआ 
खड़ा हो जाता है हर नयी सुबह वह इंतज़ार, एक इंतज़ार बन.......



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