ठहरी हुई झील सा कभी रहता है
झील की तरंगो में कभी कश्ती बन बहता है
झील की गहराइयो सा कभी लगे
हाँ मेरा ही मन मुझे कभी अजनबी सा लगे
हम तलाश में खुद की डूबते कभी उभरते हैं
किनारो की खोज में ,मंझधारो से कभी गुजरते है
मिल ही जायेंगे खुद को,सब एक सिलसिला सा लगे
हाँ मेरा ही मन मुझे कभी अजनबी सा लगे
बहुत सुन्दर रचना ...
ReplyDeleteAbhar Upasna ji
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