Pages

Monday, 28 September 2015


ठहरी हुई झील सा  कभी रहता है 
झील की तरंगो में कभी कश्ती बन बहता है 
झील की गहराइयो सा कभी लगे 
हाँ मेरा ही मन मुझे  कभी अजनबी  सा लगे 

 हम तलाश में खुद की डूबते कभी उभरते हैं
किनारो की खोज में ,मंझधारो से कभी गुजरते है
 मिल ही जायेंगे खुद को,सब एक सिलसिला सा लगे 
हाँ मेरा ही मन मुझे  कभी अजनबी  सा लगे 



2 comments: