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Friday, 18 September 2015



चाँद ,हाँ  चाँद ही तो हो तुम 
प्यार की चंदनी बिखेरते से 
कभी नेह बरसाते ,कभी तरसाते 
लुक छिप जाते कभी बादलो की छाँव तले
कभी अहसाह तेरे, पूरनमासी में बदल जाते 

ढूंढते से रह  जाते है तुम्हे पलको की छीनी चादर के पीछे से
और पाते  है तारो के बीच ,कुछ इठलाते से ,गुनगुनाते से 
कभी रुठते ,कभी मनाते से ,
शीतलता से अपनी ,मेरी रूह को भिगाते  से

शीतल तेरी छाँव मालूम है फैली है दूर तलक
और निहारती पलके मेरी ,एक चकोर बन अपलक 
ठहर जाते है अहसास, जब प्यास बन आँखों में
छलक ही जाते है चकोर की  ,कोर से अमृत की तरह...


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