Pages

Thursday, 13 August 2015

बचपना 

गुदगुदाता हुआ खिलखिलाता हुआ बचपन
उम्र के साथ क्यों खो जाता सा  बचपन
मासूमियत को बड़प्पन की मुखोटे में ढक कर सच में सोचो, क्या हमने भुलाया बचपन नहीं ,किसी कोने में मन के आज भी उछलता हैमचलता है ,आाँखो से चमकने को ,हंसी में खनकने को बंधा हुआ ,वो कसमसाता सा मासूम सा बचपन व्याकुल है ,बेकल है ज़िंदगी के इस दौड़ से दिखावे की इस होड़ से ,सहमा  सा छुप जाता है बचपन छोड़ दे क्यों न हम ,उस अहसास को उड़ जाने दे तितलियों की तरह मन आकाश में बहने दे सरिता सी सरलता जीवन मेंभटकने दे गुंजन बन ,बचपन फिर मन मेंयु ही बिना बात क्यों नहीं खिलखिलाए हमझूमती चले हवा तब साथ क्यों  न संग गायें हमथिरकने दो बूंदो सा ,बारिश के मौसम में बता दे वक़्त को , सख्त तू कितना हो लेकिनएक रोज़ बच्चा बन तू  भी मेरे संग रहेगा .....


Wednesday, 12 August 2015

























Dream it ,wish it,do it...

सपने 

शुक्रिया ठंडी हवाओ का
शुक्रिया भीगी फिज़ाओ का
झोके के ठन्डे मुलायम से अहसास ने
देखो आज बहुत प्यार से कैसे हमे सुला दिया
जागे तो जाना 

दुनिया सपनो की बहुत खूबसूरत होती है 

सपने, हाँ सपने ही तो आस है 
जीने की जो प्यास जगाते है
थकते है जब ,भटकते हैं जब राहो में
उंगलियां पकड़ यही सपने साथ निभाते है
कितने अपने है ,फिर भी वो सपने है
और हम सच की जमीन पर  खड़े हैं 
बाहें पसारे ,आस लिए ,अहसास लिए 
मन के उड़न  खटोले से  उतर
जीवन में आकर लेते उन्हें देखने की चाह में ...



Tuesday, 11 August 2015




यादें.......

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,ये काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज ,कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते है

समय फिसलता है जब ,मुट्ठी से  रेत बन
यादों के झोंके तब मन को सहलाते  हैं
जीवन के सफर के लम्बे  हैं रास्ते 
कभी साथ है कारवां ,कभी साथ सिर्फ रास्ते 
पगडंडियों में भटकते ,अकेले जब हम फिरें 
यादो के ये साये ,हमसफ़र बन जाते हैं

चलते हुआ जाना है ,रास्तो से  ये सीख ली
चाहतो से न भाग तू ,ना यादों से  हाँथ छुड़ा
जीवन में जब तक सांसों का ताना बाना है
हर नए मोड़ पर,
नयी यादों का ठिकाना है 

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते हैं


Saturday, 8 August 2015


वक़्त 

आज दो अलग - अलग रचनाएँ वक़्त पर ,आज दो अलग अलग वक़्त में लिखी हुई क्योकि वक़्त के साथ पता चला रचनाएँ वक़्त नहीं देखती आकार लेने के लिए......


मद्धम है सांसो की धुन
मद्धम दिल की सरगम 
लम्हा ये रुका हुआ 
मुस्कुरा रहा है क्यों छिप छिप कर
वक़्त के दामन में छुपा क्या है किसे पता
वक़्त ही जानता है वक़्त के राज़ कई...


*******************************************

अंदाज़ देखा आज वक़्त का कुछ इस तरह 
अँधेरी राहो पे भी जाने कोई दीप जलाता तो है
नज़र आये न आए ,ये और  बात है 
पर छुपा हुआ सा वो ,खुदा कहलाता तो है 

तपती धूप में जब तपाती है हमे ज़िंदगी 
साया बन वो खुदा  साथ आता तो है 
परिधि में  बंधी घसीटती है  जब ज़िंदगी 
दूर आसमाँ से कोई खुला ,आसमाँ दिखता तो है

ज़िंदगी का समीकररण कुछ अजीब है दोस्तों
त्रिज्याओ को नापते गुज़ार देते है वक़्त हम
और वक़्त ही सिखलाता जाता  है एक दिन
परिधि खूबसूरत सा बस वहम् है ज़िंदगी का 
जिसमे खुद को खुद ही हम बिठाते तो है

वक़्त से लड़कर जो वक़्त से पार निकल गए 
देखी तो उन्होंने भी होगी कभी हँसी,कभी नमी 
यही आसमाँ ,यही जमीं ,यही दुनियाँ ,यही कमी
पर कुछ तो जज्बा कुछ अहसास  उनमे था 
रास्तो पे आज उनके निशाँ ,नज़र आते तो है




Thursday, 6 August 2015

मुलायम सी शाम 

ढलते सूरज का मुलायम सा अहसास ,
लहरो की कलकल और ये अहसासवक़्त काश थम जाए यहीं और 
समां जाए हम आगोश में ज़िंदगी के साँसों का क्या है ,कल हो न हो 
पल जो है अभी वो पल हो न हो ठंडे से झोके की थपकियों में सोने दोनींद बहुत आ रही है ,बस यही अब सोने दो ,खोने दो फिर से एक बार ,अपनी तलाश में ज़िंदगी,नई आस लिए ....
    रूपांतरण

यह एक बहुत ही सुन्दर तस्वीर मिली आज यूँ  ही भटकते हुए. अपने आप में कितना गहरा अर्थ लिए है ये एक चित्र ,जलती हुई तीली  और खिलता हुआ कमल . कितना गहरा राज़ जीवन की सार्थकता का .जीवन ,हाँ हर दिन मोम की तरह पिघलता हुआ जीवन ,और हम सभी  किस रूप में  इसे  लेते हैं यही  दृषिकोण निर्धारित  करता  है की हमने  जीवन को सिर्फ  काटा  है या जीवन को  जिया भी  है. सब  दृष्टिकोण की बात  है कि हम क्या होना पसंद करते है ,इस जलती हुई तीली से निकलता हुआ  काला गहरा धुँआ या इस जलन में भी हम कल्पना कर सकते है उस धुएं के एक कमल में रूपांतरण की .हर दिन हमे कोई सीख दे कर जाता हैं मैंने तो पा ली आज की शिक्षा आप क्या सोचते हैं इस विषय में .मै प्रयासरत हूँ .हाँ , प्रयासरत क्योकि सीखना एक अविरल और निरंतर प्रक्रिया हैं बहती हुई नदी की तरह , इस चिंतन के साथ 

शुभ रात्रि 

Monday, 3 August 2015

         श्रावण मास 


सावन वह मास जब अपने सुन्दरतम रूप में खिल उठती है धरती ,चारो और फैली हरियाली की चुनर ओढ़ कर..सावन से  शुरू होता है फिर से त्योहारो का सिलसिला ,गांव में आज भी पड़ जाते हैं  सावन के झूले उल्लास के प्रतीक के रूप में. शिव का अतिप्रिय मास सावन, जिसका उत्साह हमे दिखाई देता है उन कावड़ियों के समूह में जो चले जाते है बम भोले रटते  हुए कठिन राहो  पर  बेपरवाह मस्त होकर शिव के रंग में रंगे हुए .
     हमारी संस्कृति में हर मास ,हर त्यौहार प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है जिसके पीछे के गहरे चिंतन की समझ खो दी है हमने वक़्त के साथ .सावन प्रतीक है उस विश्वास का ,आस्था का कि हर एक कठिन दौरके बाद आगमन होता है सरलता का ,तपन के बाद शीतलता का ,अगर प्यास है तो तृप्ति भी होगी ,बस पूरी आस्था के साथ चलते जाना है हमे ऊंचीं  नीची पगडंडियों पर जीवन की उन कावड़ियों की तरह गाते गुनगुनाते हुए .माना की ये सब शब्द लिखना आसान है ,रास्ते आसान नहीं पर पर ईश्वर ने हमे क्षमता तो दी है चलते की ,और इसलिए दिए है प्रतीक के रूप में इतने त्यौहार ,इतने वार ,इतने अलग अलग प्रकृति वाले मौसम कभी तपिश ,कभी ठिठुरन ,कभी मद बरसाता मधुमास कभी झूला झूलता सावन  और साथ में हर मौसम से जुड़े व्रत त्यौहार जिनसे आता  है जीवन में आत्म- संयम ,अनुशासन जिनके द्वारा हर मौसम के अनुरूप हम ढल  जाये आसानी से सहज रूप में  प्रकृति के साथ तारतम्य बनाते हुए .
    
सावन के प्रथम सोमवार की बधाई स्वीकार करें .