बचपना
गुदगुदाता हुआ खिलखिलाता हुआ बचपन
उम्र के साथ क्यों खो जाता सा बचपन
मासूमियत को बड़प्पन की मुखोटे में ढक कर सच में सोचो, क्या हमने भुलाया बचपन नहीं ,किसी कोने में मन के आज भी उछलता हैमचलता है ,आाँखो से चमकने को ,हंसी में खनकने को बंधा हुआ ,वो कसमसाता सा मासूम सा बचपन व्याकुल है ,बेकल है ज़िंदगी के इस दौड़ से दिखावे की इस होड़ से ,सहमा सा छुप जाता है बचपन छोड़ दे क्यों न हम ,उस अहसास को उड़ जाने दे तितलियों की तरह मन आकाश में बहने दे सरिता सी सरलता जीवन मेंभटकने दे गुंजन बन ,बचपन फिर मन मेंयु ही बिना बात क्यों नहीं खिलखिलाए हमझूमती चले हवा तब साथ क्यों न संग गायें हमथिरकने दो बूंदो सा ,बारिश के मौसम में बता दे वक़्त को , सख्त तू कितना हो लेकिनएक रोज़ बच्चा बन तू भी मेरे संग रहेगा .....
क्या बात है
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