मैं ....
मेरे होने और न होने के बीच खड़ा ये कौन,
एक मौन, कुछ शून्य की परिधि से झाँकता सा
क्योकि जब मैं नहीं होती ,बस तभी "मैं "होती हूँ
पूरी तरह अपनी व्यापकता की बाँहें पसारे,वास्तविक मैं
दूर तलक छटा बिखेरे ,खुले आकाश सी मैं
और मेरे साथ होता है ये मौन,साक्षी भाव लिए
अंदर के शून्य को परिधि से बहार निकाल
भर देता है जाने कितने अहसासों से भरपूर होने की हद तक
हर सांसो और निःस्वासो के बीच खो जाता है शून्य तब
और शेष रह जाता ,छलकता सा मौन और "मैं"
क्योकि जब मैं नहीं होती ,बस तभी "मैं" होती हूँ
साक्ष्य और साक्षी बन, अपनी व्यापकता की सार्थकता के साथ
मुस्कुराती हुई मैं .....
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