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Wednesday, 23 December 2015



हाँ सूरज हूँ मै,....

दूर कहीं क्षितिज में 
साँझ ढले थक कर 
समां जाता हूँ धरती की आगोश में
हाँ सूरज हूँ मै,

जलता है जो,तपिश में खुद की 
जहाँ  को रोशन करता हुआ 
साँझ की शीतलता में ,बुझती हुई तपिश लिए
समेट लेता हूँ रश्मियाँ अपनी 
दूर कही बहुत दूर ,एक टुकड़ा अवनि की चाह लिए
हाँ सूरज हूँ मै 

क्योकि कल फिर आना है मुझे
दुनिया को जगाने की प्यास लिए 
एक नई सुबह में ,जाने कितने लोगो की आस लिए 
जाने कितने लोगो का विश्वास लिए
हाँ सूरज हूँ मै

दूर कहीं क्षितिज में 
साँझ ढले थक कर 
समां जाता हूँ धरती की आगोश में
मिलन और जुदाई की परिभाषा से परे
एक सुन्दर आभासी सा ,अहसास लिए
हाँ सूरज हूँ मै

उभर आता है जो आनंद 
बिखर उठता है वही सुबह की लालिमा के साथ
एक शांत , सुन्दर भोर बन 
 यही प्रकृतिऔर प्रवृति है मेरी 
हाँ सूरज हूँ मै




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