चकोर
प्यास जब अतिरेक पर पहुँचती है
बस वहीँ तृप्ति में बदल जाती है जैसे
प्रतीक्षा चकोर की बस ,वही उसे जीना सिखाती है
ये प्यास ये ,ये आस ,ये प्रतीक्षा और असीम तृप्ति
यही तो बस अर्थ है जीवन का
इसी अर्थ की खोज में हैं हम सब निरंतर
कुछ जाने ,कुछ अनजाने
और कुछ इसी प्यास में पूर्णता माने लोग
बस चकोर की तरह
प्रतीक्षा
प्रतीक्षा ही तो पर्याय है जीवन का
जीने दे कुछ आस में ,कुछ प्यास में
कुछ पा लून खुद को ,खुद की तलाश में
कुछ तो मेरे पास मेरा रहने दे ज़िंदगी
मिलता कितना सुख इसमें बस कहने दे ज़िंदगी...
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