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Saturday, 19 December 2015




कुछ लम्हें ज़िंदगी के ...

कुछ लम्हे खुद में यूँ , रच बस जाते ही 
हर लम्हा ,वो लम्हे बहुत याद आते हैं
ज़िंदगी की किताब में ,सुन्दर अभिव्यक्ति की तरह
कुछ लम्हे होते हैं मीरा की भक्ति की तरह
सुंबह की लालिमा में छुपते अंधकार से 
कुछ लम्हे होते है ,मन के उद्गार से
मीठी सी मुस्कान से ,कुछ मुरली की तान से 
कुछ लम्हे होते है ,दोनों जहान से 
लम्हों लम्हों में गुजरती उस आती जाती साँस से
कुछ लम्हे होते चकोर की बुझती सी प्यास से 
दूर वन में झूमते से चंचल ,मगन मोर से
कुछ लम्हे होते हैं ,फूटती हुई भोर से 
कभी ज़िंदगी, पूरी ज़िंदगी जीने को तरसती है
कुछ लम्हे होते है जिनमे ,पूरी ज़िंदगी बसर करती है
कुछ लम्हे खुद में यूँ , रच बस जाते ही 
हर लम्हा ,वो लम्हे बहुत याद आते हैं

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