दबे दबे पाँव से आयी हौले हौले ज़िंदगी ...
सच ही है ,दबे दबे पाँव से चुपचाप रोज़ आती है ज़िंदगी
सुबह की दस्तक के साथ ,रोज़ हमे जागती है ज़िंदगी
रात और सुबह के बीच ,जो पसरा मौन है,वही तो मौत है
रोज़ एक उम्मीद ज़िंदगी की लिए ,कई सपनो से ओतप्रोत है
जाने आँखें खुले न खुले, जाने सुबह मिले न मिले
छज्जे पे सूखती कुछ अधूरी चाहते,जाने कल उन्हें धूप मिले न मिले
फिर भी सोती है हर शै दुनिया की, आशाओ की चादर लपेटे हुए
एक मौन की गोद में ,अपने सारे सपनो को समेटे हुए
कौन कहता है उम्मीदे दुनिया की मर रही है
जीने की चाह है तभी तो ,हर शै रोज़ इस मौत से गुजर रही है
एक नयी ज़िंदगी के इंतज़ार में ,रोज़ नयी आस लिए
सांसो की लय पे ,नयी सरगम की तलाश लिए
दबे दबे पॉव से रोज़ ,हौले हौले आती है ज़िंदगी
सुबह की दस्तक के साथ ,रोज़ हमे जागती है ज़िंदगी
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