कभी कभी क्यों ठहर जाना चाहता हैं मन और ठहरा ही हुआ है कुछ दिनों से चुपचाप किसी कोने में ,कॉफ़ी की चुस्कियां के साथ पिछले पलटे हुए पन्नो के और आगे अनसुनी कहानी के बीच कही फंसा हुआ ,उस पत्ते की तरह ,अलसाया सा अनमना सा बस ठहरा हुआ अपने आज में कहीं झाँकने की कोशिश में .दूर कहीं झरोखे में ताकता ,कुछ झांकता खुद की तलाश में क्योकि ये ठहरा हुआ अस्तित्व मेरा तो नहीं ,फिर कहाँ हूँ मै,
आज ,अभी इसी वक़्त में जो हैं उसी मै को स्वीकार करने और प्यार करना करना है बिना किसी शर्तो के तभी शायद निकल कर आएगा वो वास्तविक मै अंदर छुपा बैठा है जो इस कड़कड़ाते मौसम में दुबक कर रज़ाई ओठे खुद से भागता खुद से छुपता हुआ सा कम्ब्खत मन ,मुश्किल जरूर है पर नामुमकिन भी नहीं स्वयं को प्यार करना स्वयं के लिए.
उन सभी मित्रो का शुक्रिया जिन्होंने स्वीकारा मुझे ,मेरी ही तरह ,ह्रदय से ,मेरी सहजता में ढूंढा जिन आँखों ने अनोखपन ,अपनापन उन्हें ह्रदय की गहराइयों से नमन मेरा......
Thanks Thanks and Thanks for everything ...

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