बालो से अटखेलियां करती हवा ये सुन जरा
उलझे जाते हैं सपने कई ,खूबसूरत पेंच बना
क्या करू उसका बता दे अब तू जरा
चल छेड़ न मुझे ,बस कुछ साथ तू भी गुनगुना
बज़ रहा संगीत कोई ,दूर कहीं सुन जरा
और उनमे देखा झाकता अक्स मेरा
बहता तेरे साथ हवा ,मन भी मेरा बह चला
और ढल ही गया पन्नो पे फिर मन मेरा
एक ढहरी हुई ज़िंदगी में ,बहती हुई नज़्म की तरह

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