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Saturday, 10 October 2015





अहसास कुछ ओंस से 
भीगा  गया फिर कही सूखा सा पड़ा कोना मन का 
टपकते हैं शायद ओंस  बन कई अहसास चांदनी में 
मंद मंद हवाओ में घुल रहा मकरंद जैसे 
हौले से खिलती कलियाँ  गुंजन की रागिनी में 
बंद आँखों से  नज़र आती है जो दुनिया मुझको
खूबसूरत बहुत है  चाँद वो बस तेरी ही तरह ...

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