अहसास कुछ ओंस से
भीगा गया फिर कही सूखा सा पड़ा कोना मन का
टपकते हैं शायद ओंस बन कई अहसास चांदनी में
मंद मंद हवाओ में घुल रहा मकरंद जैसे
हौले से खिलती कलियाँ गुंजन की रागिनी में
बंद आँखों से नज़र आती है जो दुनिया मुझको
खूबसूरत बहुत है चाँद वो बस तेरी ही तरह ...
No comments:
Post a Comment