ओ चाँद तू सुन ले जरा ...
चाँद तुझे निहारने के ख्वाइश में एक दिन
खुद के अक्स से इश्क न हो जाये हमको
पूछते हो न तुम क्यों आते हो तुम
ठहरे से मेरे साये में हलचल मचाते हो क्यों
तेरे साये में दमकते है हम चाँद होकर
निहारते है खुद को अनजान होकर
खुदगर्ज़ है हम भी कुछ ज़माने की तरह
खुद ही तलाश में तुझको सताते है हम
ये चाँद तुझे निहारने के ख्वाइश में एक दिन
खुद के अक्स से इश्क न हो जाये हमको ....
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