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Wednesday, 29 November 2017





अनंत में प्रवेश ....

खोल दो सभी दरवाजे खिड़कियाँ अंतर्मन के
होने दो संचार संवेदनाओ की ताजी हवाओ का
बंद कमरों में भी सीलन हो जाती है जब
फिर तो ये अंतर्चेतना के रास्तें हैं
बिखरती है सुगंध जिनसे आत्मा की
सुरभित करती जाने कितने जीवन

Vandana Agnihotri​

Monday, 2 October 2017





ठहरे  हुए आज में स्थिर सा एक मन
इन लहरों के स्पंदन में डोलती कश्ती सा
पीछे छूटते पड़ाव और आगे के गंतव्य से मुक्त
उन्मुक्त अपने आज को स्वयं में समेटे
जीता जीवन का एक एक पल
हर पल में हो जैसे विसर्जित कल, आज और कल
महसूसता इस कश्ती सा हर लहर की हलचल
ठहरे हुए आज में स्थिर सा एक मन

Saturday, 27 May 2017








यह फूल

कितना हल्का हैं ना ये फूलसूरज की हलकी आभा के बीचमद्धम बहती हवा में झूमता सा
कुछ हवा को सुरभित कर
हौले से उन्हें चूमता सा
करता हो जैसे अपनी बाहें पसारे
सूरज की एक एक किरण का आलिंगनजैसे भर लेना चाहता है सूरज को
अपने कण कण में
जिसने पोषित किया उसके अस्तित्व को
जिसके प्रकाश ने उभारा उसे
कली की अंधेरी कोख से सुन्दरतम सहज रूप में

कितना हल्का है न फूल
सूरज की रश्मियों के बीच मुस्कुराता साखुद में मगन खुद में इठलाता सा
जैसे हर मुस्कराहट के साथ
करता हो सूरज की हर किरण का अभिनन्दन
जिससे सीखा उसने सुर्ख रंगो में खिलाना
जिसके सतरंगी रंगो से रंग चुराना
जैसे हर साँस के साथ खुद सूरज हो जाना

कितना हल्का है न फूल
हर आशंका से मुक्तअपनी उन्मुक्तता में इठलाता सा
सूरज की आभा में खुद सूरज हो जाता सा ....



Thursday, 18 May 2017



वह मै मेरा ...

बचपन से जो पला मुझमे
साथ मेरे जो चला मुझमे
सपना बन आँखों में
अहसास बन कभी सांसों में
उम्र भर मेरी तलाश में
कभी रहा जिया की प्यास में
वह नटखट सा मै मेरा
मुझमे यूँ मचलता है
सागर में लहरों का
संगीत जैसे चलता है
वह नटखट सा मै मेरा
आज भी मुझमे पलता है ...




Monday, 8 May 2017




कितना अद्भुत है न , ये सफर ज़िंदगी का

ज़िंदगी यूँ ही एक मोड़ पे टकरा गयी और पता चला
 इतने साल जैसे कही छुपी थी मुझमे ही मैं होकर
ये जो सफर है न अंजना सा ,जाने क्यों लगता है रिश्ता इससे बहुत पुराना सा
 कुछ उजाले बुलाते हैं ,जैसे चांदनी उतर आयी हो और जुगनू टिमटिमाते हैं
 पुकारती हो जैसे किसी दरख़्त की ओट से ज़िंदगी मुझको
 आ जाओ समेट लून तुम्हे इन उजयारी रात में
जैसे समेट लेती है चांदनी धरा को उसकी जलती बुझती प्यास में
कर लेती हूँ तब मचल कर आलिंगन उसका
हर अंधियारे को पीछे छोड़
समा जाती हूँ  गोद मे ज़िंदगी की, मै ज़िंदगी बनकर
जैसे प्रतिध्वनियां चिनारों से टकरा कर
सिमट आयी हो अंतर्मन की गहराइयों में
और शेष रह गया हो बस एक मौन अपनी निःशब्दता में भी गुनगुनाता सा
कितना अद्भुत है न , ये सफर ज़िंदगी का

Sunday, 7 May 2017




सफर ज़िंदगी का ...

मन के कोने में छुपे शब्द कई
आतुर से हैं कुछ ,व्याकुल से हैं
संवेदनाओं की लहरें बेकल सी हैं कभी चंचल सी हैं
गहराइयों में मन की उठी हलचल बेनाम हैं
आभाषित और परिभाषित के बीच जो एहसास हैं
उसे आस कहूँ या प्यास कहूँ या
बरसते हुए लम्हों को समेटने का प्रयास कहूँ
ज़िंदगी के साथ अटखेलियाँ हैं चल रही
सखियों सा हाथ थामे साथ मेरे वो चल रही
रास्तो के साथ मुड़ जा रास्तो से प्यार कर
 हर पड़ाव में एक ज़िंदगी करती है बसर
 जीने का सलीका लो खुद सीखा रही है ज़िंदगी
परिभाषाओ की परिधि के पार जा रही है ज़िंदगी
कतरा कतरा वक़्त से चुरा रही है ज़िन्दगी
हर साँस के साथ आ रही कभी जा रही है ज़िंदगी
बह चले हैं शब्द सभी पन्नो पर लहरो की तरह
एक नयी आस में एक नयी तलाश में प्यास लिए जीने की .....

Friday, 14 April 2017






आज जीवन से जुड़ी हुई दो कविताएं 

एक संवाद आज जीवन से करने का मन हुआ और झर पड़े बारिश की बूंदों की तरह  कुछ शब्द

अनमोल है तू जीवन मेरे लिए
मेरी पार्थना सा है ,मेरी आराधना सा है
कुछ धूप छाँव से भरा
तू मेरी साधना सा है

तेरी राह में कभी गिरती हूँ कभी चलती हूँ
कभी गिर गिर कर फिर सम्हालती हूँ
थाम लेना हर बार एक साथी बन
तेरी गोद में एक बच्चा बन पलती हूँ

एक संवाद आज कुछ कर लून
बढ़ कर तुझे मचल कर बाँहों में भर लून
सांसों का तना बना एक दिन टूट जायेगा
क्यों न आज ही जी भरकर तुझे प्यार कर लून

क्योकि अनमोल है तू जीवन मेरे लिए
मेरी पार्थना सा है ,मेरी आराधना सा है
कुछ धूप छाँव से भरा
तू मेरी साधना सा है

हर हाल में ख़ुशी .....

जीवन की इस राह में
स्वयं को पाने की चाह में
मन की गहराइयों के अम्बर पर
काले बादल आते तो हैं ,पर चले  चले जाते है
सीखा  जाते है हर बार
अँधियारो में फिर कैसे मै प्रकश बून लून
अनचाही उलझनों से लड़, कैसे जीवन मै तुझे चुन लून
दे जाते हर बार और गहरी आस और गहरा विश्वास
जीवन के लिए और गहरी प्यास
घनघोर बारिश के बाद बदलो की चीरता
उफरता है हर बार सतरंगी इंद्रधनुष कोई
हाँ उसी तरह उभर आतें हैं  हम भी
जीवन की इस राह में
स्वयं को पाने की चाह में
अपने अपने जीवन की अपनी अपनी सीख है
ज़िद है हमारी भी सिख कर इनसे पार जाना है
अनमोल है तू जीवन बहुत मेरी आराधना की तरह
हर हाल में तेरा हाथ थामे साथ मुझको जाना है
जीवन की इस राह में
स्वयं को पाने की चाह में
चुन लेती हूँ मै अपनी बाहें पसारे 
हर हाल में ख़ुशी




Thursday, 13 April 2017







अरुण  बोलता है

सुदूर क्षितिज पर देखा है मैंने
मिलते हैं ये धरती और गगन
मेरी अरुणिमा की झीनी चादर के पार
जाकर देखो कभी अद्भुत ये संगम

सुना है कभी इन लहरों में बहता संगीत कोई
जैसे मचलती लहरों में बह रही हो प्रीत कोई
एक प्यास सागर में समां जाने की
हाँ मैंने देखी है एक आस
हर बून्द की सागर हो जाने की

सुनो हर कण प्रकृति का कुछ बोलता है
जागोगे कब इंसान तुमसे ये तुम्हारा अरुण बोलता है


Monday, 10 April 2017


बहुत दिनों बाद कुछ लिखने को जी चाहता है.
लता जी की मधुर आवाज़ ने स्पंदन जगा दिया .....


स्पंदन


हर सांसों के साथ
चलता है स्पंदन ह्रदय का
आती और जाती सांसो के बीच
ठहर सा जाता है कभी जीवन
एक नयी सांस, एक नयी आस
एक नए जीवन की तलाश लिए
कुछ मीठी यादों की छाँव में
बहुत से मधुर लम्हो की प्यास लिए

हर साँसों के साथ
चलता है स्पंदन ह्रदय का
आती और जाती साँसों के बीच
मचल जाता है कभी मन
एक बच्चा बन चाँद को
बांहो में समेटने की चाह लिए
कभी उजारा ,कभी कुछ रंग स्याह लिए
बिखर जाता है जीवन पटल पर
हर बार नयी रचना का आभास लिए


हर साँसों के साथ
चलता है स्पंदन ह्रदय का








Friday, 31 March 2017



सपनो की गालियाँ


तेरे सपनो की गलियो से
गुजतरे है कुछ रास्ते मेरे
कुछ सपने सुनहरे से
कुछ मचलते अहसास मेरे
चल चुन ले कुछ समय की साख से
चल बुन ले कुछ सच सा इस आभास से
क्योकि तेरे सपनो की गलियों से


गुजरते है कुछ रास्ते मेरे

Friday, 17 March 2017



एक संवाद ..
आस पास हूँ तेरे अहसास की तरह
बह रहा हूँ तुझमे सांस की तरह

चुभ रहा फिर सीने में क्यों दर्द है 

कभी गर्म थपेड़े कभी हवा सर्द है
तपती धूप में तेरी छाया हूँ
तू खोजता  
मंदिरो  में मैं तो तेरा साया हूँ 
दर्द तेरा पीता हूँ तुझमे मै भी जीता हूँ

तू मुझसे रूठे तो मै भी रीता रीता हूँ 
बह रहा हूँ तुझमे मेरे आभास की तरह
आस पास हूँ तेरे अहसास की तरह

Wednesday, 8 March 2017




सुंदर तन की परिधि में सिमटा
एक कोमल ह्रदय ,भाव से तरबतर
और उसकी भी गहराइयों में छुपा
एक अद्भुत गहरा व्यक्तितव
अपनी अस्तित्व की खोज में
निरंतर जीवन की धुरी पे घूमता
धरा सा धैर्य और विस्तृत आकाश सा विश्वास लिए
आयी हो तुम स्वयं में बहुत कुछ खास लिए..



महिला दिवस की शुभकामनायें
साथ ही आभार उन सभी दोस्तों का जिन्होंने नारी मन की गहराइयो को समझने की और उसे स्वीकारने का प्रयास किया और सिर्फ महिला दिवस पर ही नहीं अपने जीवन में भी उसे वही सम्मान दिया जो आज यहाँ सबकी पोस्ट में दिखाई दे रहा है......

Wednesday, 1 March 2017






मन को छूती तस्वीर, जिसके स्पर्श से मन से निकले उद्गार उतर आये फिर एक रचना बन

सुदूर पर्वतों पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई
झरोखे का पट हौले से खोल कर
घुल कर हवाओं के साथ जैसे पहुँची है
कानो में मीठी से शब्द घोलती,सी
कुछ अनकही मुझसे बोलती सी
काफी की चुस्कियो में एक मिठास सी घोलती सी
सुदूर पर्वतो पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई
अपनी आहट से अनाहत जगाती हुई
कोई गीत मधुर गुनगुनाती हुई
सुदूर पर्वतो पर गूँजी है प्रतिध्वनि कोई ......

Thursday, 2 February 2017







शब्दो के मोती चुनकर,जीवन गीत पिरोना है

शब्दो के मोती चुनकर,जीवन गीत पिरोना है
नैनो की बहती सरिता ,सागर में डुबोना है
बाकि तो इस रंगमंच का,ये हँसना ये रोना है

कभी चलें कभी रुके,ये कैसा पथ सलोना है
अंदर तू बैठा मेरे फिर, क्या पाना क्या खोना है
बाकि तो इस रंगमंच का ,ये हँसना ये रोना है

मिटटी से उपजे हम ,एक दिन मिटटी ही होना है
तेरी ही गोद में सर रखकर, एक दिन नींद में सोना है
बाकी तो इस रंगमंच का ,ये हँसना ये रोना है

कुछ कुछ बाकि धुंधला सा मेरे मन कोना है
 तुझसे ही उजियारा लेकर,अंतर्मन को संजोना है
बाकि तो इस रंगनच का ये हँसना ये रोना है


 

Wednesday, 25 January 2017












मधुमास

मधुमास और पिया की आस
कुछ नयन का धीर,कुछ हिया की प्यास
मधुमास और पिया की आस

बसंत की बयार,और उमड़ता प्यार
सागर में उमड़े घुमड़े  ज्यो नदिया की धार
मधुमास और पिया की आस

कोयक की कूक,जैसे जिया की हूक
 बौराया मन ज्यो बौराई अमियारी जाये झुक
मधुमास और पिया की आस


Tuesday, 24 January 2017

बच्चे हमारी जीवन बगिया में खिले सूंदर और अद्भुत फूल.क्या सोचा है हमने की किस तरह का वातावरण ,किस तरह की खाद और किस तरह के पानी से सिंचित कर रहे हैं हम इन फूलो को जिन्हें बड़े ही जतन से हमने अपनी बगिया में उगाया है.
  बच्चो के प्रथम गुरु माता पिता और पहली पाठशाला उनका अपना घर और परिवार होता है जिनके बीच वह खेलते कूदते हुए सीखते, सम्हलते हुए बड़े होते हैं. जिस तरह का आचरण वो अपने आस पास देखते हैं वही उनके मन के दर्पण पे अंकित होता जाता है.अतः आवश्यकता है हमे इस बात का ध्यान रखने की, कि हम उनके मन के दर्पण में दुनिया की, परिवार की, दोस्तों की ,व्यव्हार की किस तरह कि छबि अंकित कर रहे है ......

    तुमसे जाना सूरज भैया और चंद मेरा मामा है
    माँ बाबा का हाथ पकड़ ही मैंने चलना जाना है
    चिड़िया जो फुदकती जाना, गाती वो एक गाना है
    मन के तारो की सरगम ,बस तुमको ही बजाना है
    दे दो जैसा रूप ,ढल जाऊँ मैं वैसे है
    कच्ची माटी रच लेती सुन्दर दुनिया जैसे है  
    संस्कारो से रंगों मुझे या कर दो बेरंग मुझे
    तुम्हारे ही पदचिन्हों में चलना है संग मुझे
    तुमसे जाना सूरज भैया और चंद मेरा मामा है
    माँ बाबा का हाथ पकड़ ही मैंने चलना जाना है
   

Sunday, 15 January 2017




वह रास्ता खड़ा वहीँ..

रात के अंधियारे में गुम है ,पर रास्ता है खड़ा  वहीँ
कुछ उलझे सुलझे  विचारो में गुम है, पर रास्ता है खड़ा वहीँ
ढूंढते है हम जिसे, इधर उधर बस उम्र भर
मन में गढ़ी दीवारों में गुम हैं ,पर रास्ता है खड़ा वहीँ

बस खोल दो झरोखे मन के ,कुछ उजाला जाने दो
अंदर के  हर कोने को, कुछ उजला हो जाने दो
दीवारों से झांकता तभी, दिखेगा तुम्हे वहीँ
पुकारता तुम्हे प्यार से ,वह रास्ता खड़ा वहीँ...

Friday, 13 January 2017



मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने 
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
पलाश को तलाश जिसकी ,गुलमोहर को आस जिसकी
बसंत की बयार सा क्यों रस बहाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
आसमां का हाथ थामे ,आसमां के पार तक
सतरंगी रंगो में क्यों बिखर जाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
सागर में मचलती उन लहरो सा मौज़ ले
सागर में जीवन सरिता मिलाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है
धुंध की चादर लपेटे गुनगुनी उस धुप ने
जो कहा हवाओं से वो गीत गाना चाहता है
मन जलतरंग सा क्यों गुनगुनाना चाहता है

Sunday, 8 January 2017




कुछ पंक्तियाँ इस तस्वीर पर ....


आसमान से उतर कर ह्रदय की गहराइयो में समाती है
अद्द्भुत एक अनुभूति है प्रेम, नैनो में सपने दे जाती है
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सिमट जाता है पूरा संसार जैसे मेरी बाहों में
जब तुम घनश्याम ले लेते हो अपनी पनाहो में

रोम रोम जैसे तेरा ही गीत गाता है
जब मधुर मुस्कान लिए तू पास मेरे आता है

पलकों पे बैठ जाते है सतरंगी सपने कई
जब पलके मूंद तू धुन कोई बजाता है

कुछ कुछ राधा सी कुछ श्याम सी है
कुछ कुछ उजियारी कुछ घनश्याम सी है

प्रीत की रीत है बड़ी अलबेली ,अटपटी
तपती धूप में, तरुवर से मिलतेआराम सी है