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Friday, 28 August 2015



अहसास भीगे भीगे से

छेड़ी है सरगम कुछ रात की तन्हाइयो ने 
खो रहा है चाँद क्यों बादलो की परछाइयों में 
फूटती चांदनी लेकिन कर रही है चुगलियाँ
कुछ फुसफुसाहट बिखेरती है ये बिज़लियाँ 
सुर से सुर मिला ले ये सोचते है हम खड़े  
लो एक और नयी धुन ,सुबह के इंतज़ार में है.... 
टपक रहे हैं चांदनी से ,अहसास कई देखो न 
और भीग चले है शब्द मेरे ,चांदनी में नहाये हुए....

Monday, 24 August 2015


एक और सावन बीता...
एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा ,कुछ रह गया रीता-रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई  ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता
पर मंजिलो की तलाश दौड़ती रही ,कभी रूकती ,कभी चलती 
गिरती राहो पे ,कभी ख्वाबो के पर बुनती ,घुनती कभी  तलाशती 
नटखट कभी ,उदास सी ,सावन में भीगे रास्तो में एक गीले अहसास सी 
ज़िंदगी एक और कदम आगे ,कभी जीते विश्वास तो कभी भरम आगे 
तपिश में पड़ती ओस की बूंदो सी उड़ती रही ये ज़िंदगी 
और एक और सावन बीता ,कुछ मन भीगा कुछ रह गया रीता रीता 
भीगी सी राहो पे मिले हमराही कई ,कभी रास्ता रह गया अकेला सा जीता 
एक और हाँ एक और सावन बीता ,भीगी सी यादें ,कुछ टपकते अहसास देकर...

Saturday, 22 August 2015


एक अभिनन्दन पत्र आप सभी मित्रो के नाम ,अवश्य पढ़े...
जीवन : निर्झर से सरिता होने की यात्रा है..


निर्झर लेखनी एक प्रयास है पूर्णता नहीं.निर्झर लेखनी एक निरंतर प्रक्रिया है  सीखने की , प्रतिदिन जीवन से, आस पास की घटित घटनाओ से ,दूसरो के जीवन से ,मन में हिलोरे लेती भावनाओ से ,तो कभी दिमाग में बादलो की तरह घुमड़ते विचारो से ,उन्हें पहचानने की ,समझने की और और मन की परिपाटी में मंथन कर उसमे से सीख रुपी अमृत को आत्मसात कर जीवन में उतारने की ताकि एक दिन बन जाये जीवन बहती हुई नदी की तरह शांत सुरम्य  और अपने अंदर पड़े सभी पथरो ,मिटटी ,कंकड़ो से ऊपर उठ निर्मल जल की धारा के रूप में परिणित . 
     पर उस शांत नदी के बहाव में बदलने के पहले गुजरना होता है निर्झर को ,ऊँचे नीचे चट्टानों से ,उठते ,गिरते रास्तो से तब कही निर्झर बदलता है एक समलत पे बहती धारा के रूप में शांत ,सुरम्य गहराई लिए निर्मल और निश्छल.

वही जल ,वही उद्गम है निर्झर और सरिता का एक,पर एक ही यात्रा के दो भिन्न पहलू  ,जीवन यात्रा के दो अलग -अलग स्तर  को दर्शाते जिनका उद्देश्य एक ही है सागर की ओर गमन.उसी तरह हम सब एक ही स्त्रोत्र से निकल कर  एक ही यात्रा के सहभागी है.
   
मै आभारी हूँ अपने मित्रो का जिन्होंने मुझे कदम कदम पर ये बताया की किस तरह आगे बढ़ने के लिए  अपनी लेखनी को और गहराई में ढालने के लिए सुधार की आवश्यकता है. आभारी हूँ मेरी सखी का जिसने कुछ दिनों पहले मुझे बताया की कुछ बात है जो पहले जैसे नहीं मन को छू रही है लेखनी मेरी. मैंने अपनी हर पोस्ट पे यही लिखा है मै प्रयासरत हूँ  क्योकि सीखना एक निरंतर प्रक्रिया है अंत तक हमे हर दिन हर पल सीखना है.
  मेरी रचनाओ के साथ पूर्णतः ईमानदारी करने की चेष्टा होती है मेरी ,जो महसूस कर पाती हूँ अपने आस पास के वातावरण से ,अपने जीवन से मित्रो के जीवन से वही ढालने का प्रयास होता है मेरा और हमेशा रहेगा .ह्रदय से आमंत्रित है आप सबके विचार ,आप सब  का प्यार ,आप सब की प्रेरणा जो मुझे रोज़ आगे बढ़ाती है एक कदम और निर्झर से नदी बनने की प्रक्रिया में . मेरा सौभाग्य जो इतने सच्चे और अच्छे मित्रो का साथ ईश्वर ने दिया मुझे .ह्रदय से पूरी प्रसन्नता के साथ अभिनन्दन. 

Tuesday, 18 August 2015



शब्द :कुछ अहसासों से तरबतर

ब्द ,हाँ शब्द जाने कभी अटखेलियां खेलते से क्यों है
पकड़ो तो  पकड़ आते नहीं दौड़ते है बच्चो सा, आँख मिचोलियाँ खेलते क्यों है
लो लपक कर पकड़ा एक शब्द मैंने,दुबका हुआ था भीगा सा
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
पहचान मेरी क्या ये सोचती  क्यों हो , मै तो बेरंग हूँ ,बेनाम हूँ ,अनजान हूँ
पानी में पानी बन मिल जाऊंगा ,हवाओं से जोड़ो मुझे खुशबुएँ बिखराऊंगा
उमंगो से रंगो या आंसुओ के छींटे दो  ,जिस  अहसास में ढालो मै उसमे रंग जाऊंगा 
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
मै सोच में हूँ क्या रंग दूँ,हंसी से जोड़ दूँ ,या दर्द  का उसे संग दूँ
इंतज़ार ढालू पन्नो पे ,या एतबार की लकीरे उकेरूँ 
सोचती भर दूँ रंग चकोर की प्यास का ,या बिखेरूं रंग उसके विश्वास का 
आस्थाओं की खुशबुएँ हवाओ में घोल दूँ ,दिल से छलकता जो क्या वो मधुरस घोल दूँ
उड़ेल दूँ  कोमल से सुन्दर से अहसासों को,पिघलने दूँ मौन अब शब्दों में मोम बन
भर लिया अंक में तरबतर उस शब्द को ,और देखो भीगा गया वो एक पन्ना आज फिर आँचल की तरह...

Sunday, 16 August 2015




खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
निर्झरो ने छेड़ी देखो ये कैसे रागिनी है
झूमते है बादल भी ,इठलाती इस चांदनी में
फूटती है रौशनी ,छीनी सी एक रंध से भी
लुक चिप ले चाहे ,चाँद कितना भी ओट में

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत में
मद्धम सा बहना ,फिर मद्धम में मिल जाना
खिल जाना जैसे हौले से ,एक गुलाब का खुल जाना
कोमल सा अहसास ,हवाओ में जैसे घुल जाना

खो रही है लहरे ,मचल कर लहरो की अागोश में
इस पार से उस पार तक सब डूबा हुआ संगीत
नीली सी चांदनी में  नहा गया मन आज भी
और सुखी रह गयी,फिर भी आस कई ...



Thursday, 13 August 2015

बचपना 

गुदगुदाता हुआ खिलखिलाता हुआ बचपन
उम्र के साथ क्यों खो जाता सा  बचपन
मासूमियत को बड़प्पन की मुखोटे में ढक कर सच में सोचो, क्या हमने भुलाया बचपन नहीं ,किसी कोने में मन के आज भी उछलता हैमचलता है ,आाँखो से चमकने को ,हंसी में खनकने को बंधा हुआ ,वो कसमसाता सा मासूम सा बचपन व्याकुल है ,बेकल है ज़िंदगी के इस दौड़ से दिखावे की इस होड़ से ,सहमा  सा छुप जाता है बचपन छोड़ दे क्यों न हम ,उस अहसास को उड़ जाने दे तितलियों की तरह मन आकाश में बहने दे सरिता सी सरलता जीवन मेंभटकने दे गुंजन बन ,बचपन फिर मन मेंयु ही बिना बात क्यों नहीं खिलखिलाए हमझूमती चले हवा तब साथ क्यों  न संग गायें हमथिरकने दो बूंदो सा ,बारिश के मौसम में बता दे वक़्त को , सख्त तू कितना हो लेकिनएक रोज़ बच्चा बन तू  भी मेरे संग रहेगा .....


Wednesday, 12 August 2015

























Dream it ,wish it,do it...

सपने 

शुक्रिया ठंडी हवाओ का
शुक्रिया भीगी फिज़ाओ का
झोके के ठन्डे मुलायम से अहसास ने
देखो आज बहुत प्यार से कैसे हमे सुला दिया
जागे तो जाना 

दुनिया सपनो की बहुत खूबसूरत होती है 

सपने, हाँ सपने ही तो आस है 
जीने की जो प्यास जगाते है
थकते है जब ,भटकते हैं जब राहो में
उंगलियां पकड़ यही सपने साथ निभाते है
कितने अपने है ,फिर भी वो सपने है
और हम सच की जमीन पर  खड़े हैं 
बाहें पसारे ,आस लिए ,अहसास लिए 
मन के उड़न  खटोले से  उतर
जीवन में आकर लेते उन्हें देखने की चाह में ...



Tuesday, 11 August 2015




यादें.......

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,ये काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज ,कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते है

समय फिसलता है जब ,मुट्ठी से  रेत बन
यादों के झोंके तब मन को सहलाते  हैं
जीवन के सफर के लम्बे  हैं रास्ते 
कभी साथ है कारवां ,कभी साथ सिर्फ रास्ते 
पगडंडियों में भटकते ,अकेले जब हम फिरें 
यादो के ये साये ,हमसफ़र बन जाते हैं

चलते हुआ जाना है ,रास्तो से  ये सीख ली
चाहतो से न भाग तू ,ना यादों से  हाँथ छुड़ा
जीवन में जब तक सांसों का ताना बाना है
हर नए मोड़ पर,
नयी यादों का ठिकाना है 

यादों के उजाले जलने दो राहो में
सफर के अंधेरो में ,काम आते  हैं
कभी ढलता सूरज कभी फैली चांदनी
कभी रात अँधेरी हो जब
जुनगुओ की तरह ,ये रास्ते दिखाते हैं


Saturday, 8 August 2015


वक़्त 

आज दो अलग - अलग रचनाएँ वक़्त पर ,आज दो अलग अलग वक़्त में लिखी हुई क्योकि वक़्त के साथ पता चला रचनाएँ वक़्त नहीं देखती आकार लेने के लिए......


मद्धम है सांसो की धुन
मद्धम दिल की सरगम 
लम्हा ये रुका हुआ 
मुस्कुरा रहा है क्यों छिप छिप कर
वक़्त के दामन में छुपा क्या है किसे पता
वक़्त ही जानता है वक़्त के राज़ कई...


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अंदाज़ देखा आज वक़्त का कुछ इस तरह 
अँधेरी राहो पे भी जाने कोई दीप जलाता तो है
नज़र आये न आए ,ये और  बात है 
पर छुपा हुआ सा वो ,खुदा कहलाता तो है 

तपती धूप में जब तपाती है हमे ज़िंदगी 
साया बन वो खुदा  साथ आता तो है 
परिधि में  बंधी घसीटती है  जब ज़िंदगी 
दूर आसमाँ से कोई खुला ,आसमाँ दिखता तो है

ज़िंदगी का समीकररण कुछ अजीब है दोस्तों
त्रिज्याओ को नापते गुज़ार देते है वक़्त हम
और वक़्त ही सिखलाता जाता  है एक दिन
परिधि खूबसूरत सा बस वहम् है ज़िंदगी का 
जिसमे खुद को खुद ही हम बिठाते तो है

वक़्त से लड़कर जो वक़्त से पार निकल गए 
देखी तो उन्होंने भी होगी कभी हँसी,कभी नमी 
यही आसमाँ ,यही जमीं ,यही दुनियाँ ,यही कमी
पर कुछ तो जज्बा कुछ अहसास  उनमे था 
रास्तो पे आज उनके निशाँ ,नज़र आते तो है




Thursday, 6 August 2015

मुलायम सी शाम 

ढलते सूरज का मुलायम सा अहसास ,
लहरो की कलकल और ये अहसासवक़्त काश थम जाए यहीं और 
समां जाए हम आगोश में ज़िंदगी के साँसों का क्या है ,कल हो न हो 
पल जो है अभी वो पल हो न हो ठंडे से झोके की थपकियों में सोने दोनींद बहुत आ रही है ,बस यही अब सोने दो ,खोने दो फिर से एक बार ,अपनी तलाश में ज़िंदगी,नई आस लिए ....
    रूपांतरण

यह एक बहुत ही सुन्दर तस्वीर मिली आज यूँ  ही भटकते हुए. अपने आप में कितना गहरा अर्थ लिए है ये एक चित्र ,जलती हुई तीली  और खिलता हुआ कमल . कितना गहरा राज़ जीवन की सार्थकता का .जीवन ,हाँ हर दिन मोम की तरह पिघलता हुआ जीवन ,और हम सभी  किस रूप में  इसे  लेते हैं यही  दृषिकोण निर्धारित  करता  है की हमने  जीवन को सिर्फ  काटा  है या जीवन को  जिया भी  है. सब  दृष्टिकोण की बात  है कि हम क्या होना पसंद करते है ,इस जलती हुई तीली से निकलता हुआ  काला गहरा धुँआ या इस जलन में भी हम कल्पना कर सकते है उस धुएं के एक कमल में रूपांतरण की .हर दिन हमे कोई सीख दे कर जाता हैं मैंने तो पा ली आज की शिक्षा आप क्या सोचते हैं इस विषय में .मै प्रयासरत हूँ .हाँ , प्रयासरत क्योकि सीखना एक अविरल और निरंतर प्रक्रिया हैं बहती हुई नदी की तरह , इस चिंतन के साथ 

शुभ रात्रि 

Monday, 3 August 2015

         श्रावण मास 


सावन वह मास जब अपने सुन्दरतम रूप में खिल उठती है धरती ,चारो और फैली हरियाली की चुनर ओढ़ कर..सावन से  शुरू होता है फिर से त्योहारो का सिलसिला ,गांव में आज भी पड़ जाते हैं  सावन के झूले उल्लास के प्रतीक के रूप में. शिव का अतिप्रिय मास सावन, जिसका उत्साह हमे दिखाई देता है उन कावड़ियों के समूह में जो चले जाते है बम भोले रटते  हुए कठिन राहो  पर  बेपरवाह मस्त होकर शिव के रंग में रंगे हुए .
     हमारी संस्कृति में हर मास ,हर त्यौहार प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है जिसके पीछे के गहरे चिंतन की समझ खो दी है हमने वक़्त के साथ .सावन प्रतीक है उस विश्वास का ,आस्था का कि हर एक कठिन दौरके बाद आगमन होता है सरलता का ,तपन के बाद शीतलता का ,अगर प्यास है तो तृप्ति भी होगी ,बस पूरी आस्था के साथ चलते जाना है हमे ऊंचीं  नीची पगडंडियों पर जीवन की उन कावड़ियों की तरह गाते गुनगुनाते हुए .माना की ये सब शब्द लिखना आसान है ,रास्ते आसान नहीं पर पर ईश्वर ने हमे क्षमता तो दी है चलते की ,और इसलिए दिए है प्रतीक के रूप में इतने त्यौहार ,इतने वार ,इतने अलग अलग प्रकृति वाले मौसम कभी तपिश ,कभी ठिठुरन ,कभी मद बरसाता मधुमास कभी झूला झूलता सावन  और साथ में हर मौसम से जुड़े व्रत त्यौहार जिनसे आता  है जीवन में आत्म- संयम ,अनुशासन जिनके द्वारा हर मौसम के अनुरूप हम ढल  जाये आसानी से सहज रूप में  प्रकृति के साथ तारतम्य बनाते हुए .
    
सावन के प्रथम सोमवार की बधाई स्वीकार करें .