अहसास भीगे भीगे से
छेड़ी है सरगम कुछ रात की तन्हाइयो ने
खो रहा है चाँद क्यों बादलो की परछाइयों में
फूटती चांदनी लेकिन कर रही है चुगलियाँ
कुछ फुसफुसाहट बिखेरती है ये बिज़लियाँ
सुर से सुर मिला ले ये सोचते है हम खड़े
लो एक और नयी धुन ,सुबह के इंतज़ार में है....
टपक रहे हैं चांदनी से ,अहसास कई देखो न
और भीग चले है शब्द मेरे ,चांदनी में नहाये हुए....


