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Tuesday, 18 August 2015



शब्द :कुछ अहसासों से तरबतर

ब्द ,हाँ शब्द जाने कभी अटखेलियां खेलते से क्यों है
पकड़ो तो  पकड़ आते नहीं दौड़ते है बच्चो सा, आँख मिचोलियाँ खेलते क्यों है
लो लपक कर पकड़ा एक शब्द मैंने,दुबका हुआ था भीगा सा
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
पहचान मेरी क्या ये सोचती  क्यों हो , मै तो बेरंग हूँ ,बेनाम हूँ ,अनजान हूँ
पानी में पानी बन मिल जाऊंगा ,हवाओं से जोड़ो मुझे खुशबुएँ बिखराऊंगा
उमंगो से रंगो या आंसुओ के छींटे दो  ,जिस  अहसास में ढालो मै उसमे रंग जाऊंगा 
हाँ पाया शब्द मैंने ,कुछ खुशबुओं से भरा  ,कपकपाते हुए कोने में खड़ा 
बारिश में नहाया सा ,कुछ कुछ शरारतो में लिपटा,कुछ अहसासों से तरबतर
मै सोच में हूँ क्या रंग दूँ,हंसी से जोड़ दूँ ,या दर्द  का उसे संग दूँ
इंतज़ार ढालू पन्नो पे ,या एतबार की लकीरे उकेरूँ 
सोचती भर दूँ रंग चकोर की प्यास का ,या बिखेरूं रंग उसके विश्वास का 
आस्थाओं की खुशबुएँ हवाओ में घोल दूँ ,दिल से छलकता जो क्या वो मधुरस घोल दूँ
उड़ेल दूँ  कोमल से सुन्दर से अहसासों को,पिघलने दूँ मौन अब शब्दों में मोम बन
भर लिया अंक में तरबतर उस शब्द को ,और देखो भीगा गया वो एक पन्ना आज फिर आँचल की तरह...

4 comments:

  1. Sunder rachana, Shabdon ke saath anupam khel

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  2. शब्दों का लीला, कृष्ण लीला सा मधुर एवं मनमोहक।

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